निशाने पर कर्मचारी
जम्मू कश्मीर में लक्ष्य करके हत्या करने के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। गुरुवार को आतंकवादियों ने कुलगाम में एक बैंक मैनेजर की गोली मारकर हत्या कर दी। पिछले एक महीने में लक्षित हत्या का यह आठवां मामला है। इस तरह पांच नागरिकों और तीन पुलिसकर्मियों की हत्या हो चुकी है। ये …
जम्मू कश्मीर में लक्ष्य करके हत्या करने के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। गुरुवार को आतंकवादियों ने कुलगाम में एक बैंक मैनेजर की गोली मारकर हत्या कर दी। पिछले एक महीने में लक्षित हत्या का यह आठवां मामला है। इस तरह पांच नागरिकों और तीन पुलिसकर्मियों की हत्या हो चुकी है। ये पुलिसकर्मी ड्यूटी पर तैनात नहीं थे। 1 मई से तीसरी बार किसी गैर-मुस्लिम सरकारी कर्मचारी की हत्या की गई है।
दो दिन पहले जम्मू के सांबा जिले की शिक्षिका रजनी बाला की कुलगाम जिले के गोपालपुर में गोली मारकर हत्या कर दी थी। इससे पहले 12 मई को राहुल भट की बडगाम जिले की चदूरा में तहसीलदार कार्यालय के अंदर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अब आतंकवादी सरकारी कर्मचारियों को भी निशाना बना रहे हैं। यह बेहद गंभीर मुद्दा तथा चिंता का विषय है। हालांकि आतंकवाद के खिलाफ प्रशासन और केंद्र सरकार बेहद सख्त है।
इस साल अभी तक करीब 90 आतंकियों को ढेर किया जा चुका है, लेकिन कश्मीर के 18 नागरिक और घाटी में ही सक्रिय 15 जाबांज भी ‘शहीद’ हुए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू के विभिन्न जिलों के लगभग आठ हजार कर्मचारी अंतर-जिला स्थानांतरण नीति के तहत कश्मीर में काम कर रहे हैं। लेकिन बढ़ती लक्षित हत्याओं को देखते हुए असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। पहली बार यह रोष सामने आया है कि सरकार ने कश्मीरी पंडितों को जम्मू या किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर नहीं भेजा, तो वे सामूहिक तौर पर घाटी के सरकारी दफ्तरों से पलायन कर जाएंगे।
हत्याओं के सिलसिले या आतंकवाद 1990 से भिन्न है, क्योंकि इस बार मुसलमान, सिख, प्रवासी आदि सभी को मारा जा रहा है। गुरुवार को ऑल जम्मू-बेस्ड रिज़र्व कैटेगरी एंप्लॉयीज एसोसिएशन के बैनर तले जम्मू में इकट्ठा हुए प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे काम पर नहीं जाएंगे, क्योंकि सरकार लक्षित हत्याओं को रोकने और उन्हें सुरक्षित माहौल मुहैया कराने में विफल रही है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा उन्हें समझाने में जुटे हैं, लेकिन इस बार आतंकवाद ने सभी को दहशत में डाल दिया है। ऐसी घटनाएं प्रशासन के सब कुछ सामान्य होने के दावों का भेद खोलती हैं। इससे निपटने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि सुरक्षा एजेंसियां हिंसा के इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए कोई रणनीति बनाए। नई रणनीति से ही आतंकवाद की नई शैली को तोड़ा जा सकेगा।
