हल्द्वानी: दादा की मेहनत को पोते ने लगाए पंख, बरसों की मेहनत आज ला रही रंग

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Edited By Amrit Vichar
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भूपेश कन्नौजिया, हल्द्वानी। पहाड़ धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगल में तब्दील होते जा रहे हैं जो कभी फलपट्टी क्षेत्र हुआ करता था आज वहां होटल-रिसार्ट बनने लगे हैं। नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर के समीप पड़ने वाले सतबुंगा,रामगढ़,सूपी सहित अन्य गांव अपने सेब और आडू के लिए पूरे देश ही नहीं बल्कि विश्व में पहचान रखते हैं। …

भूपेश कन्नौजिया, हल्द्वानी। पहाड़ धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगल में तब्दील होते जा रहे हैं जो कभी फलपट्टी क्षेत्र हुआ करता था आज वहां होटल-रिसार्ट बनने लगे हैं। नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर के समीप पड़ने वाले सतबुंगा,रामगढ़,सूपी सहित अन्य गांव अपने सेब और आडू के लिए पूरे देश ही नहीं बल्कि विश्व में पहचान रखते हैं। अंग्रेजों ने यहां तमाम सेब की किस्मों को सुधारा और फलपट्टी को आधुनिक तकनीकी से संवारने का कार्य भी किया लेकिन अब फलपट्टी का दायरा कम होने लगा है।

राजेंद्र सिंह लोधियाल

लेकिन इन सब के बीच कुछ ऐसे लोग आज भी समाज में हैं जिन्होंने अपने दादा-परदादा से मिली अनमोल धरोहर को संजों कर रखा है और उसे लगातार विकसित भी कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ नैनीताल जिले के सतबुंगा क्षेत्र के रहने वाले राजेंद्र लोधियाल हैं जो आज भी अपने दादा डिकर सिंह के द्वारा बनाए गए सेब के बाग देवबन आचर्ड को संवारने के साथ नई उन्नत किस्मों को भी आने वाली पीढ़ियों से रूबरू करवा रहे हैं।

एक पहाड़ी में मौजूद विशाल सेब का बगीचा लोगों की आकर्षण का केंद्र तो है ही वहीं सेब सहित अन्य फलों से लकदक पेड़ देख पर्यटक रोमांचित हो उठते हैं। सेब की खास प्रजाति डीके डेलीसेज आज भी उसी स्वाद, रंग और खुशबू लिए मशहूर है जो ब्रिटिश समय में था। आस-पास के गांवों में आज भी यह सेब विद्यमान है और इसकी मिठास आज भी लोगों की जुबान पर रस घोलती है।

फिलहाल राजेंद्र अपने अन्य व्यवसाय से इतर आज भी अपने इस बाग को संजों कर रखे हुए हैं और इस बाग में सेब के अलावा नाशपाती, प्लम, चेरी, बादाम सहित हिमांचल के सेब की अन्य प्रजाति तैयार कर रहे हैं। जिनका दीदार पर्यटक भी करना नहीं भूलते और जैविक खेती पर आधारित यह बाग लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

दादा ने अंग्रेजों से सीखा था उन्नत तकनीकों के बारे में खुद भी करते रहे शोध
हल्द्वानी। ब्रिटिश शासकों ने पर्वतीय क्षेत्रों में फलों के उत्पादन की जानकारी देने के उद्देश्य से 1932 में चौबटिया में पर्वतीय फल शोध केंद्र की स्थापना की थी। 1953 में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत ने पर्वतीय विकास का सपना देखा और रानीखेत स्थित मालरोड में उद्यान विभाग का निदेशालय फल उपयोग विभाग उत्तर प्रदेश की स्थापना की। 1988 में उत्तर प्रदेश सरकार ने निदेशालय का भवन चौबटिया में बनाने का निर्णय लिया और 1992 में यह भवन बनकर तैयार हो गया।

राजेंद्र के दादा डिकर सिंह द्वारा तैयार किया गया सेब का बगीचा

यह निदेशालय उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग यूपी के नाम से जाना जाता है। यहां वैज्ञानिकों की लंबी चौड़ी फौज थी। बस यही से राजेंद्र के दादा को नई दिशा मिली उन्होंने प्रशिक्षण लिया और फिर धीरे-धीरे बगीचे में डीके डेलिसेज सेब की प्रजाति को विकसित किया। आपको बता दें कि चौबटिया से ही अंग्रेजों ने पूरे कुमाऊं को उन्नत प्रजाति के सेब दिए थे जिनमें किंग डेविड, विंटर बनाना, गोल्डन डेलीसेस, बर्किंघम, रेड गोल्ड, गोल्डन वैली जैसी सेब की प्रजातियां थीं, इन प्रजातियों को अंग्रेज विदेश से अपने साथ लाए थे। चौबटिया गार्डन की खास उपलब्धि थी यहां उत्पादित प्रिंस ऑफ चौबटिया की प्रजाति।

विदेशी सेब की प्रजाति दे रही अधिक मुनाफा
राजेंद्र बताते हैं कि अब हालांकि कास्तकार मुनाफा ज्यादा देखता है और सेब का आकार, फल उसकी चमक, स्वाद कीमत तय करता है, पिछले चार सालों पर नजर डालें तो फल पट्टी क्षेत्र में विदेशी सेब के बागों में वृद्धि हुई है। रामगढ़, मुक्तेश्वर, धारी सहित आसपास के क्षेत्र से हर साल दो लाख टन सेब का उत्पादन होता है, जिसे देशभर की मंडियों में भेजा जाता है। रामगढ़, मुक्तेश्वर सहित आसपास का क्षेत्र फल उत्पादन के लिए जाना जाता है और यहां विभिन्न प्रकार के पहाड़ी सेब और अन्य फलों की खेती की जाती है। इन दिनों अब कास्तकार इटली के डिलीशियस, फैनी स्काटा, स्कर्ट लेट स्पर, जर्मन प्रजाति के रेड चीफ, ग्रीन स्मिथ, हॉलैंड प्रजाति के रेड स्पर डेलेसिएस, रेड कॉर्न, मिजगाला, किंग रॉड, रेड लमगाला सहित विभिन्न प्रजातियों के सेब का उत्पादन करना पसंद कर रहे हैं।

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