गाथा मधुमेह की
एक सप्ताह से मैं अपने और पत्नी के इलाज हेतु गाजियाबाद रुका हूं। हम दोनों के प्यार में मिठास बहुत अधिक थी। सो हम दोनों डायबिटिक हो गए। मेरे में कुछ अधिक था इसलिए मैं 1983 में ही हो गया,पत्नी में थोड़ा कम था,वह दस साल बाद हुई। लोग डायबिटीज से अनायास ही डरते हैं …
एक सप्ताह से मैं अपने और पत्नी के इलाज हेतु गाजियाबाद रुका हूं। हम दोनों के प्यार में मिठास बहुत अधिक थी। सो हम दोनों डायबिटिक हो गए। मेरे में कुछ अधिक था इसलिए मैं 1983 में ही हो गया,पत्नी में थोड़ा कम था,वह दस साल बाद हुई। लोग डायबिटीज से अनायास ही डरते हैं जबकि यह पिछले जन्म के पुण्य प्रताप से होती है। डायबिटिक व्यक्ति बहुत ही संयमी, संतोषी, अनुशासित और ऊर्जावान होता है। बगल में कोई बटर चिकन, बिरियानी खा रहा हो,मजाल है कि वह रोटी, हरी सब्जी के अलावा कुछ और खाए।
मिष्ठान्न, खीर, सेवईं, आइसक्रीम आदि मीठी वस्तुओं की तरफ देखता भी नहीं। अनुशासित इतना कि जाड़ा हो या गर्मी टहलने, कसरत, योग, प्राणायाम करना नहीं छोड़ता। इसीलिए हम अपने को सौभाग्यशाली मानते हैं कि हम मधुमेह रोगी हैं। जब किसी मित्र या संबंधी के घर जाते हैं तो गर्व से अपने को डायबिटिक बताते हुए फीकी चाय की फरमाइश करते हैं। सेवाकाल में जब कोई सहयोगी मुझसे मेरी तोंद न निकलने,तथा स्लिम, स्मार्ट बने रहने का राज पूछता तो मैं मुस्कुराते हुए बताता कि यह आपसे नहीं हो पाएगा क्योंकि आप डायबिटिक नहीं हैं।
मैं 1983 में प्रतापगढ़ में सीओ था। शिकार करने के अलावा मैं प्रतिदिन प्रातः पुलिस खेलटीम के साथ 2-3 किमी दौड़कर वापह आ अधिकारियों के साथ 9 बजे तक लान टेनिस खेलता तथा सीओ लाइन होने के कारण शाम चार बजे कार्यालय से सीधे पुलिस लाइन जाकर जो भी खेल हो रहा हो,खेलता। सप्ताह में प्रायः चार ,पांच दिन यह व्यवस्था रहती। मैं जिला पुलिस की वालीबाल, फुटबॉल, हाकी, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, रिवाल्वर -रायफल शूटिंग टीम का नियमित सदस्य था।
कुछ समय बाद मुझे कमजोरी महसूस होने लगी, मैं सीएमओ डा. कपूर को दिखाया, उन्होंने इसे मेरा वहम बताया। मेरे जिद करने पर विटामिन की गोलियां दी। कमजोरी बनी रहने पर एक सप्ताह बाद मैं पुनः गया तो वह ताकत का एक इंजेक्शन लगवा दिए। एक शुक्रवार की परेड पर मैने पुलिस अधीक्षक से कहा कि मुझे कमजोरी लग रही है, मैं खड़ा नहीं रह सकता। उन्होंने मुझे तत्काल सीएमओ के पास भेजा जहां उन्होंने फिर वहम बताकर मुझे ताकत का इंजेक्शन देना चाहा लेकिन मैं झगड़कर उठ दिया और घंटाघर चौराहे के पास अनुभवी डा.कपूर के पास जाकर पूरी बात बताई।
उन्होंने तत्काल मेरा शर्करा परीक्षण कराया जिसमें डाइबिटीज की पुष्टि हो गई। उन्होंने मुझे दवा न देकर कुछ दिन खानपान में परहेज बताया। परहेज पूछने पर बोले कोई खास परहेज़ नहीं बस मिठाई तो खाना बेकार ही है, शिकारी हो आलू वैसे भी नही खाते होंगे,चावल तोंद बढ़ाता है आदि। वह विनोदी स्वभाव के बुजुर्ग थे, न- न करते हुए सारे परहेज बता गए।
मैं डायबिटीज की बात सुनते ही अवसाद में आ गया। 1981 में मैं अपनी मां को डाइबिटीज से इलाहाबाद मेडिकल कालेज में एक माह तक घुट-घुट कर मरते देखा था,जिससे डायबिटीज से मैं डर गया था और यह जानते हुए कि यह अनुवांशिक रोग है, मैं मिठाई से परहेज़ तथा शारीरिक श्रम नियमित करता था। मुझे पता था कि यह रोग मुझे होगा लेकिन इतनी शीघ्रता से ,यह न सोचा था। मैं तत्काल एक सप्ताह का अवकाश लेकर गांव चला आया। मां तो थी नहीं, पिताजी को इस विषय में कुछ नहीं बताया कि वे परेशान न हों ।धीरे-धीरे अवसाद कुछ कम हुआ लेकिन डर बना रहा।
मैं प्रतापगढ़ के बाद प्रयागराज में सीओ कोतवाली 1986 से 1989 तक रहा। कई बार कमजोरी आई, पैर में दर्द हुआ, बार-बार पेशाब जाना पड़ता था,यह सभी लक्षण मधुमेह के हैं। मैं रक्त परीक्षण कराता लेकिन शर्करा स्तर सामान्य मिलता। यहां तक कि डाक्टरों ने कह दिया कि मुझे मधुमेह था ही नहीं। जब मैं 1991 में सिख आतंकवाद निरोधक अभियान का प्रभारी बन कर पीलीभीत आया तो एक छोटे फोड़े के आपरेशन के बाद घाव न भरने पर डाक्टर ने रक्त शर्करा परीक्षण कराया तो स्तर बहुत अधिक बढ़ा मिला। तब से दवा का नियमित सेवन प्रारंभ हुआ जो अब इंसुलिन इंजेक्शन तक पहुंच गया।
