कमजोर होता रुपया
बढ़ती महंगाई के बीच लगातार कमजोर होता रुपया निश्चित रूप से एक बड़े खतरे का संकेत है। डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले कुछ वर्षों में लगातार कमजोर होता गया है और अब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में एक अमेरिकी डॉलर 80 भारतीय रुपए के बराबर हो गया है। तात्कालिक तौर पर इसके तीन प्रमुख कारण बताए …
बढ़ती महंगाई के बीच लगातार कमजोर होता रुपया निश्चित रूप से एक बड़े खतरे का संकेत है। डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले कुछ वर्षों में लगातार कमजोर होता गया है और अब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में एक अमेरिकी डॉलर 80 भारतीय रुपए के बराबर हो गया है। तात्कालिक तौर पर इसके तीन प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। पहला रूस-यूकेन युद्ध, दूसरा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और तीसरा दुनिया की बड़ी अर्थव्यस्थाओं द्वारा लिए गए कड़े मौद्रिक फैसले।
यह दलील भी सही है कि दुनिया के तमाम देश इन दिनों महंगाई की मार से त्रस्त हैं और प्रमुख मुद्राएं भी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं लेकिन जिस तरीके से रुपया टूट रहा है, वह चिंताजनक है। 31 दिसंबर 2014 को एक अमेरीकी डॉलर की कीमत 63 रुपए 33 पैसे थी जोकि 18 जुलाई 2022 को 79 रुपए 98 पैसे हो गई। यह लगभग 26 प्रतिशत की गिरावट है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव यह रहा कि विदेशी संस्थागत निवेशकों-एफआईआई ने भारतीय बाजार से लगातार निकासी की और कर रहे हैं।
अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशक वहां के बाजार में पैसा लगाना फायदे का सौदा मान रहे हैं। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर इसका विपरीत असर पड़ रहा है। एक बड़े कदम के तहत रिजर्व बैक ने आयात निर्यात को रुपए में संयोजित करने का प्रयास किया है। इससे कारोबारियों के सामने विदेशी मुद्रा के खतरों में कमी आएगी और रूस जैसे देश के साथ कारोबार में भुगतान संबंधी अड़चने दूर होंगी। रिजर्व बैंक ने विदेशों में रह रहे भारतीयों को भारत में पैसे जमा करने के लिए भी सहूलियतें दी हैं।
केन्द्रीय बैंक ने एक एफसीएनआर (बी) और एनआरई जैसे सावधि जमा खातों को भारत में खोलने के लिए प्रोत्साहित किया है और रिजर्व ब्याज की शर्तों में काफी ढील दे दी है। दरअसल विदेशों के भारतीय नॉन रेजिडेंट एक्सटर्नल और नॉन रेजिडेंट ऑर्ङिनरी रुपी जैसे खाते भारत में खोल सकते हैं लेकिन इनमें अभी तक प्रवासी भारतीयों ने कोई खास रूचि नहीं दर्शायी है। सरकार और कारपोरेट कर्ज में एफपीआई निवेश की सीमा खत्म कर दी गई है और अब अल्पकालिक कारपोरेट कर्ज में एफपीआई निवेश का रास्ता सुगम हो गया है।
एक ऐसी प्रणाली पर भी काम जारी है जिसमें बिना डॉलर भारत में आयात किया जा सके। बावजूद इसके अभी और जमीनी प्रयासों की जरूरत है। भारत की अर्थव्यस्था आज भी ज्यादातर कृषि आधारित है। आड़े वक्त में खेती काम आती है। खेती किसानी और छोटी घरेलू बचत को बढ़ावा देकर आंतरिक मोर्च पर जनता को फौरी राहत देने के प्रयास होने चाहिए। छोटे श्रम प्रधान घरेलू उद्योगों पर भी ध्यान देना होगा तथा मुफ्त अनाज जैसी योजनाओं को बंद कर रोजगार पर फोकस करना होगा।
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