मुरादाबाद : सूफी अंबा प्रसाद ने फिरंगियों के खिलाफ कलम को बनाया था हथियार

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मुरादाबाद, अमृत विचार। महानगर के मोहल्ला कानूनगोयान निवासी क्रांतिकारी सूफा अंबा प्रसाद ने अपनी कलम को ही फिरंगियों के खिलाफ हथियार बना लिया था। उन्होंने कलम के जरिये न केवल आजादी की अलख जगाई बल्कि मुरादाबाद से हैदराबाद, पंजाब और ईरान तक अंग्रेजों के जुल्म-ओ-सितम की खिलाफत भी की। सूफी अंबा प्रसाद का जन्म मूल …

मुरादाबाद, अमृत विचार। महानगर के मोहल्ला कानूनगोयान निवासी क्रांतिकारी सूफा अंबा प्रसाद ने अपनी कलम को ही फिरंगियों के खिलाफ हथियार बना लिया था। उन्होंने कलम के जरिये न केवल आजादी की अलख जगाई बल्कि मुरादाबाद से हैदराबाद, पंजाब और ईरान तक अंग्रेजों के जुल्म-ओ-सितम की खिलाफत भी की।

सूफी अंबा प्रसाद का जन्म मूल रूप से अगवानपुर निवासी गोविंद प्रसाद के घर सन् 1862 को हुआ था। उनके दादा कांजीमल मुरादाबाद के मोहल्ला कानूनगोयान में बस गए थे। सूफी अंबा प्रसाद का दाहिना हाथ जन्म से ही खराब था। वह उर्दू, फारसी, हिंदी और अंग्रेजी के प्रकांड विद्वान थे। सूफी अंबा प्रसाद ने देश की पराधीनता और अंग्रेजों के जुल्म की इंतेहा देख कर सन 1887 में कानूनगोयान में सुदर्शन प्रेस की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने यहां से उर्दू में साप्ताहिक पत्र सितारे हिंद का प्रकाशन शुरू किया।

समाचार पत्र के जरिये उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का ऐसा बिगुल बजाया कि अंग्रेजों में खलबली मच गई। नतीजा यह हुआ कि फिरंगियों ने उनके अखबार का प्रकाशन बंद करा दिया और उन पर मुकदमा भी चलाया। तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर सिराजुद्दीन ने उन्हें तीन माह कैद की सजा सुनाई, परंतु वह अपील पर छूट गए। इसके बाद भी उनकी कलम नहीं रुकी, बल्कि उन्होंने दोगुने जोश के साथ अंग्रेजों के खिलाफ लेखनी को हथियार बनाया। इसके बाद उन्होंने सिराजुद्दीन का कार्टून अखबार में प्रकाशित किया। कार्टून देख कर सिराजुद्दीन भड़क गए और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

इस बार उन्हें डेढ़ साल कैद की कड़ी सजा सुनाई गई। जेल से छूटने के बाद सन 1890 में उन्होंने जामेठल उलूम साप्ताहिक अखबार प्रकाशित किया। इसमें भी उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आग उगलने वाले लेख लिखे। इस अखबार में वह नवाब रामपुर के खिलाफ भी लिखते रहते थे। एक बार नवाब रामपुर यहां आए तो उन्होंने अखबार में खबर छापी। इस खबर का शीर्षक था ‘नवाब रामपुर आये, भाग आये, भाग आये। यह पढ़कर नवाब साहब आगबबूला हो गए और सूफी जी के खिलाफ फिर मुकदमा दर्ज करा दिया। सूफी अंबा प्रसाद ने भाग की व्याख्या भाग्य के अर्थ में की, जिस पर मुकदमा खारिज हो गया। अगले अंक में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ फिर लिखा।

उनकी आग उगलती लेखनी से ब्रिटिश सरकार तिलमिला गई और तीन साल के सश्रम कारावास की कठोर सजा सुनाते हुए छापाखाने पर छापा मारा। तब वह श्री राम दरबार के आदमकद चित्र के पीछे आले में छिप गए। इसके बाद अंग्रेजी सरकार उनके पीछे ही पड़ गई, मगर वह हर बार चकमा देते रहे। सन् 1897 में आखिरकार वह पुलिस के हत्थे चढ़ गए। अंग्रेजी सरकार ने उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया। इसके बाद उन्होंने मुरादाबाद की जेल में 18 माह की सजा काटी। बाद में वह हैदराबाद चले गए और लाला लाजपत राय के निर्देशन में निकलने वाले समाचार पत्र हिंदुस्तान पत्र के लिए लिखने लगे। कानूनगोयान निवासी कैलाश भटनागर बताते हैं कि बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में वह पंजाब चले गए और सरदार अजीत सिंह के साथ आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए। सन 1916 में पेशवा नाम से अखबार निकाला।

ब्रिटिश सरकार ने जब उन पर शिकंजा कसना शुरू किया तो वह ईरान चले गए और शिराज नगर से फारसी में आबे हयात का प्रकाशन शुरू कर दिया। सन 1917 में अंग्रेजों की सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और मृत्युदंड की सजा सुनाई। 21 जनवरी 1917 को जब सिपाहियों ने उन्हें गोली मारने के लिए जेल की कोठरी खोली तो देखा सूफी जी समाधि लगाए बैठे थे। वहीं पर उन्होंने इस नश्वर शरीर का त्याग कर दिया।

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