कहानी : बिल्ली की दुम !

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• राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी प्रो.गौतम पार्टी के नेता भी थे। उनको वफादार-चेला मिल गया – महावीर। महावीर कहानी लिखने लगा। उन दिनों कहानी के बहुत से अखाड़े हुआ करते थे। प्रो.गौतम ने महावीर को एक अखाड़े के उस्ताद के पास भेज दिया। महावीर ने कहानी सुनाई – बिल्ली की दुम। उस्ताद उछल पड़े। दूसरे ही …

• राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

प्रो.गौतम पार्टी के नेता भी थे।
उनको वफादार-चेला मिल गया – महावीर।
महावीर कहानी लिखने लगा।
उन दिनों कहानी के बहुत से अखाड़े हुआ करते थे।
प्रो.गौतम ने महावीर को एक अखाड़े के उस्ताद के पास भेज दिया।
महावीर ने कहानी सुनाई – बिल्ली की दुम।
उस्ताद उछल पड़े।
दूसरे ही दिन दंगल की घोषणा कर दी।
उस्ताद के हाथ में मीडिया का सूत्र था, सो रातोंरात खबर फैल गई।
बड़े-बड़े आलोचना-कसरती अखाड़े पर एकत्र हुए और जोर दिखाने लगे।
बहस छिड़ गई- बिल्ली की दुम में कौन-कौन से नये प्रयोग हैं?
बिल्ली की दुम में आम-आदमी का क्या स्वरूप है?
बिल्ली की दुम ने नये तकनीक की धरती कैसे तोड़ी है?
बिल्ली की दुम में भोगे हुए यथार्थ का क्या स्वरूप है?
बिल्ली की दुम क्या व्यक्तिवादी रचना है?
अथवा इसमें जनवादी तेवर है?
क्या बिल्ली की दुम में व्यक्तिमन की परतें खुली हैं?
अन्त में उस्ताद ने अध्यक्षीय भाषण दिया-विदेशी कथाकारों की लंबी सूची उद्धृत कर दी, दंगल में सन्नाटा छा गया ।
उस्ताद ने कहा कि- बिल्ली की दुम। अस्सी के दशक की सर्वश्रेष्ठ कहानी है।
बिल्ली की दुम ने कहानी के इतिहास में नये युग का सूत्रपात किया है!
उस्ताद के पास ही विभागाध्यक्ष भी बैठे थे, बोले- अगले सत्र से बिल्ली की दुम को सिलेबस में शामिल कर लिया जायेगा।
आज महावीर की गिनती महान कथाकारों में होती है, बिल्ली की दुम को क्लास में मैने भी पढ़ाया है, विद्यार्थी उसे क्या समझे भगवान ही जाने, सच कहूं, बिल्ली की दुम का तत्वबोध मुझे आज तक नहीं हो सका!
जिन्हें हो गया हो, उन्हें मुबारक हो!