अस्थिर सरकारें

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Edited By Amrit Vichar
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कोरोना जैसी महामारी के वैश्विक संकट के बीच होली के दौरान अगर किसी विषय के बारे में बात हुई तो वह था मध्य प्रदेश का सियासी ड्रामा। यह राजनीतिक हलचल राजनीति में रुचि रखने वालों के लिए चर्चा का विषय थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा का दामन थामना और शुक्रवार को राज्यसभा के लिए नामांकन …

कोरोना जैसी महामारी के वैश्विक संकट के बीच होली के दौरान अगर किसी विषय के बारे में बात हुई तो वह था मध्य प्रदेश का सियासी ड्रामा। यह राजनीतिक हलचल राजनीति में रुचि रखने वालों के लिए चर्चा का विषय थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा का दामन थामना और शुक्रवार को राज्यसभा के लिए नामांकन करना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। यही भारतीय राजनीति का अब नियम बन गया है। ‘एक हाथ दो, दूसरे हाथ लो’ ही हमारे लोकतंत्र की अब पहचान बनता जा रहा है।

लोकतंत्र के उत्सव में जब कोई मतदाता अपने पसंदीदा प्रत्याशी को मतदान कर रहा होता है तो उसके मत से जीता हुआ प्रत्याशी बाद में दूसरे राजनीतिक दल का रुख कर लेता है, कारण चाहे जो भी हो। मगर इस बात का अब मतदाताओं को भी कोई फर्क नहीं पड़ता है। उन्हें भी पता है कि राजनीति में राजनेताओं के लिए ‘जनता की सेवा’ करने के क्या अर्थ हैं। स्थिति बहुत हास्यास्पद तो है, मगर अब आश्चर्यजनक बिलकुल भी नहीं रही।

किसे पता था कि महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनेंगे और जनता का भाजपा-शिवसेना गठबंधन को दिया बहुमत देखता रह जाएगा। कहीं भाजपा ने बाजी मारी तो कहीं उसे मुंह की खानी पड़ी। दल चाहे कोई भी हो, उसका विधायक जनता की सेवा करने के लिए इतना आतुर रहता है कि दल-बदलने के दौरान वह किसी रिसॉर्ट या बड़े होटल में अपने परिवार से कटे हुए रहना पसंद करता है, पूरी मौजमस्ती के साथ। कहीं पसंद नहीं करता है तो उससे ऐसा जबरन भी करवाया जाता है।

जैसा कि मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार गठन के बाद ज्योतिरादित्य की नाराजगी से महसूस किया जा रहा था कि वहां कुछ नया होगा, ऐसा ही हुआ। इसमें किसी को कोई आश्चर्य भी नहीं हुआ। ज्योतिरादित्य राज्यसभा जाएंगे। हमारे देश के दो बड़े दलों भाजपा और कांग्रेस ने लोकतंत्र में लोगों के मत का कभी सम्मान नहीं किया। खासकर राज्य सरकारों के परिप्रेक्ष्य में यह बात ज्यादा लागू होती है। स्पष्ट बहुमत की सरकारें भी गिरतीं दिखाई दी हैं।

मध्य प्रदेश में फिलहाल कमलनाथ सरकार सीटों की गणित के हिसाब से अल्पमत में है, आगे क्या होगा यह देखने वाली बात है। वह भी तब जब कांग्रेस के पास बहुमत था। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में अगर जनता के मत का सम्मान नहीं होता है तो इसका सीधा अर्थ यह है कि इन राजनीतिक दलों को जनता की राय से कोई लेना-देना नहीं है। होगा वही जो राजनीतिक दल चाहेंगे। क्या जनता इतनी जागरूक होगी कि वह अपने मत का असम्मान होने के बाद इसके लिए जिम्मेदार राजनेता को सबक सिखाए?