समस्या देश की
मध्य प्रदेश में सियासी घमासान के बीच उच्चतम न्यायालय में मामले की सुनवाई चल रही है। इसमें गुरुवार को न्यायालय ने महत्वपूर्ण टिप्पणी देते हुए कहा कि यह समस्या किसी एक राज्य की नहीं बल्कि पूरे देश की है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी खुद-ब-खुद भारतीय राजनीति की वर्तमान परंपरा की ओर इशारा करती है। …
मध्य प्रदेश में सियासी घमासान के बीच उच्चतम न्यायालय में मामले की सुनवाई चल रही है। इसमें गुरुवार को न्यायालय ने महत्वपूर्ण टिप्पणी देते हुए कहा कि यह समस्या किसी एक राज्य की नहीं बल्कि पूरे देश की है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी खुद-ब-खुद भारतीय राजनीति की वर्तमान परंपरा की ओर इशारा करती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हम नहीं चाहते कि मध्य प्रदेश में हॉर्स ट्रेडिंग हो, इसलिए वहां जल्द से जल्द फ्लोर टेस्ट कराया जाना चाहिए।
आज के राजनीतिक दौर में किसी भी सूरत में सत्ता पर कब्जा ही राजनीतिक दलों का एजेंडा बन चुका है। राज्यों में आए दिन सरकारों की उठापटक जैसे राजनीति का हिस्सा बन गया है। किसी भी दल की सरकार बनती है और वह भी बहुमत के साथ, इसके बाद भी कोई गारंटी नहीं कि कब सरकार पर खतरा पैदा हो जाए। दरअसल यह हमारे राजनेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पराकाष्ठा है कि वह निजी हितों की पूर्ति के लिए कभी भी पाला बदलने के तैयार रहते हैं।
आज तमाम राज्यों की सरकारों को देख लें तो अंदाजा हो जाएगा। सरकार में शामिल विधायक या मंत्री पहले किसी और दल के साथ थे। चुनाव से पूर्व, चुनाव बाद कभी भी निजी हितों के लिए राजनेता दल-बदलने पर आमादा रहते हैं। एक छोटा सा उदाहरण उत्तराखंड का देखें जहां वर्तमान में काबिज भाजपा सरकार में आधे से ज्यादा वह मंत्री हैं जो इससे पूर्व की कांग्रेस सरकार में मंत्री थे। ऐन वक्त पर दल बदला, भाजपा में आए और यहां भी मंत्री।
इस राजनीतिक अस्थिरता के बीच विकास की बातें मजाक बनकर रह जाती हैं। अब मध्य प्रदेश में पिछले कई दिनों से जो राजनीतिक ड्रामा हो रहा है, ऐसे में सरकार की कार्यशैली के क्या मायने? यही कारण है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद हमारे देश के राज्यों की सरकारों में नौकरशाही के हावी होने की बातें सामने आती रहती हैं।
नौकरशाहों को भी मालूम है कि हमारे राजनेताओं की क्या दृष्टि है और उन्होंने तंत्र को कितना नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में दल-बदल कानून को और सख्त किए जाने की जरूरत है। खासकर तब जब चुनाव जीतने के बाद कोई विधायक या सांसद दल बदलता है। मतदाता उसे अपनी पसंदीदा पार्टी से जिताकर विधानसभा या संसद में भेजता है, मगर चुनाव के बाद अगर वह निजी हितों के लिए दल बदल लेता है तो यह मतदाता के साथ भी ठगी ही तो है।
हालांकि मतदाता भी इस बात का अभ्यस्त हो चुका है, और चुनाव में शायद वह एक औपचरिकता के लिए ही हिस्सा लेता है, इसीलिए हमारे देश में मतदान का प्रतिशत भी कम रहता है। मगर चुनी हुई सरकारें स्थायी रूप से चलें, इसके लिए तो कम से कम दल-बदलुओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए।
