महामारी से सीख

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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दुनिया भर में कोविड -19 के तेजी से प्रसार ने राष्ट्रीय और राजनीतिक सीमाओं की रक्षा से इतर स्वास्थ्य के मोर्चे पर किए गए हमारे प्रयासों पर पुनर्विचार करने का एक मौका दिया है। इस नए वायरस (दुश्मन) के खिलाफ सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना नहीं, बल्कि सफेद वर्दी के सैनिकों चिकित्सकों, नर्सों व स्वास्थ्य कर्मियों …

दुनिया भर में कोविड -19 के तेजी से प्रसार ने राष्ट्रीय और राजनीतिक सीमाओं की रक्षा से इतर स्वास्थ्य के मोर्चे पर किए गए हमारे प्रयासों पर पुनर्विचार करने का एक मौका दिया है। इस नए वायरस (दुश्मन) के खिलाफ सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना नहीं, बल्कि सफेद वर्दी के सैनिकों चिकित्सकों, नर्सों व स्वास्थ्य कर्मियों पर है। अधिकांश देश अपनी राजनीतिक सीमाओं की रक्षा के लिए सुसज्जित थे, जबकि कोई भी देश इस दुश्मन से लड़ाई के लिए सुसज्जित नहीं था।

कोरोना के हमले ने पूरी दुनिया को पूरी तरह से आश्चर्यचकित कर दिया। हालांकि चीन जैसे देश जीवन-रक्षक उपकरणों और बुनियादी ढांचे के उत्पादन को एक उल्लेखनीय गति से बढ़ाने में सक्षम रहे। इटली, फ्रांस, स्पेन और अमेरिका जैसे देश भी इस हमले को संभाल नहीं पाए हैं। इस मामले में भारत भी अपने आप को असहाय पाता है क्योंकि हमारे चिकित्सा संसाधन पुराने, बीमार और असमान रूप से वितरित होने वाले साबित होते हैं।

नए दुश्मन से लड़ने के लिए, स्वास्थ्य का बचाव रक्षा के साथ किया जाना चाहिए। सेना को एक उपयुक्त चिकित्सा शस्त्रागार के साथ सफेद वर्दी में लैस करना अनिवार्य है ताकि वे अपनी और लोगों की रक्षा कर सकें। कोरोना की महामारी को लेकर आज आज दुनियाभर में इस बात की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है कि वायरस संक्रमण के लिए अब चिकित्सा अनुसंधान क्षेत्र को नए सिरे से काम करने की जरूरत है।

इस लड़ाई को केवल कुछ विषाणुजनित बीमारियों के लिए विषाणुरोधी टीके बनाकर नहीं बल्कि इसे लेकर बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। फिलहाल तो देश-विदेश की सरकारें इस बात पर विचार कर रही हैं कि अगर कोरोना का संक्रमण और खिंचता है तो किस स्तर पर स्वास्थ्य उपकरणों, डॉक्टरों को बचाव के किट आदि की जरूरत होगी।

कोरोना से लड़ाई में सबसे बड़ी समस्या यह आने वाली है कि चिकित्सकों के पास रोगी को उपचार करते वक्त पहनी जाने वाली पीपीई (पर्सनल प्रोटक्शन इक्विपमेंट) किट ही उपलब्ध नहीं हैं। यह इस बात से समझा जा सकता है कि दिल्ली सरकार ने इस बारे में कह दिया है कि पैसे की कमी नहीं है बल्कि ऐसी किट की उपलब्धता एक चुनौती जरूर है। तो समझा जा सकता है कि वायरस जन्य रोगों से लड़ने के िलए हमारी वैश्विक लड़ाई अभी कितने कमजोर स्तर पर है जहां रोगी को बचाने वालों के पास पहले खुद को बचाने के ही पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं।

वैश्विक स्तर पर यह देखने में आ चुका है कि रोगियों को बचाने के चलते कई चिकित्सक, पैरा-मेडिकल स्टाफ भी अपनी जान गंवा चुके हैं। इसका मतलब साफ है कि वायरसजन्य रोगों से बचाव के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। दुनिया के देशों को अभी एक दूसरे से मतभेद भुलाकर इस पृथ्वी को एक परिवार मानते हुए इस लड़ाई से सीख लेते हुए चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ना होगा, इसी में विश्व का कल्याण निहित है।