कुपोषण की चुनौती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि कुपोषण की चुनौतियों से निपटने में सामाजिक जागरुकता से जुड़े प्रयास महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि कुपोषण के खिलाफ पूरे देश में अनेक रचनात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। सितम्बर का महीना त्योहारों के साथ-साथ पोषण से जुड़े बड़े …
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि कुपोषण की चुनौतियों से निपटने में सामाजिक जागरुकता से जुड़े प्रयास महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि कुपोषण के खिलाफ पूरे देश में अनेक रचनात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। सितम्बर का महीना त्योहारों के साथ-साथ पोषण से जुड़े बड़े अभियान को भी समर्पित है।
भारत को कुपोषण मुक्त कराने के लिए सामाजिक जागरुकता और सरकार की ओर से चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री ने आग्रह किया कि आगामी पोषण माह में, कुपोषण को दूर करने के प्रयासों में हिस्सा जरूर लें। दरअसल कुपोषण भारत की गंभीरतम समस्याओं में एक है। फिर भी इस पर सबसे कम ध्यान दिया गया है।
आज भी दुनिया की कुपोषित आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा भारत में रहता है और वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत 101वें स्थान पर है। बढ़ते भू-राजनीतिक संघर्ष, वैश्विक जलवायु परिवर्तन से जुड़े मौसम की चरम सीमा और महामारी से जुड़ी आर्थिक एवं स्वास्थ्य चुनौतियां भुखमरी के स्तर को बढ़ा रही हैं। कुपोषण का वैश्विक प्रसार लगातार बढ़ रहा है। आर्थिक विकास के बावजूद भारत के सामने कुपोषण से लड़ने की बड़ी चुनौती है।
प्रश्न यह है कि आजादी के 75 वर्षों के बाद भी भारत से कुपोषण जैसी समस्या को समाप्त क्यों नही किया जा सका है? यद्यपि आजादी के बाद से भारत में खाद्यान्न के उत्पादन में पांच गुना वृद्धि हुई है, परंतु कुपोषण का मसला चुनौती बना हुआ है। कुपोषण की समस्या खाद्यान्न की उपलब्धता न होने के कारण नहीं है, बल्कि आहार क्रय करने की क्रयशक्ति कम होने के कारण है। गरीबी के कारण क्रय शक्ति कम होने एवं पौष्टिक आहार की कमी के कारण कुपोषण जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं।
परिणामस्वरूप लोगों की उत्पादन क्षमता कम होने लगती है, जिससे लोग निर्धनता एवं कुपोषण के चक्र में फंसने लगते है। हालांकि बीते 40 साल के दौरान भारत में बहुत से पोषण कार्यक्रम चलाए गए। वर्ष 2000 के बाद से भारत ने इस क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति की है, लेकिन अभी भी बाल पोषण चिंता का मुख्य क्षेत्र बना हुआ है। हमें जलवायु परिवर्तन से उपजी चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा। जलवायु परिवर्तन न सिर्फ आजीविका, पानी की आपूर्ति और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर रहा है, बल्कि खाद्य सुरक्षा के लिए भी चुनौती खड़ी कर रहा है।
इसका सीधा असर कुपोषण पर पड़ता है। बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रत्येक को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध न हो पाना और साफ सफाई न होने के कारण कुपोषण की समस्या और अधिक गंभीर रूप ले लेती है। कहा जा सकता है कि कुपोषण देश की विकास प्रक्रिया में बाधा बना हुआ है। देश को विश्व की महाशक्ति बनने के लिए कुपोषण को समाप्त करना होगा।
