बढ़ती खाई
अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा वातावरण बेहद नाजुक है। शीत युद्ध के बाद के दौर में भूराजनीतिक तनाव और परमाणु हथियारों से जुड़े खतरे इस वक्त सबसे ज्यादा गंभीर हैं। लिहाजा परमाणु हथियारों में कटौती और निरस्त्रीकरण का रास्ता इस समय सबसे ज्यादा प्रासंगिक दिखाई देता है। परमाणु खतरे के साये में दुनिया भर में कई तरह के …
अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा वातावरण बेहद नाजुक है। शीत युद्ध के बाद के दौर में भूराजनीतिक तनाव और परमाणु हथियारों से जुड़े खतरे इस वक्त सबसे ज्यादा गंभीर हैं। लिहाजा परमाणु हथियारों में कटौती और निरस्त्रीकरण का रास्ता इस समय सबसे ज्यादा प्रासंगिक दिखाई देता है। परमाणु खतरे के साये में दुनिया भर में कई तरह के संकट गहरा रहे हैं। इनमें मध्य पूर्व और कोरिया प्रायद्वीप से लेकर यूक्रेन पर रूसी हमले समेत दुनिया भर के तमाम कारक शामिल हैं।
हाल ही में परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) की समीक्षा के लिये दसवां अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन न्यूयॉर्क में हुआ। वर्ष 1970 में लागू हुए परमाणु अप्रसार संधि के पक्षकार देश प्रत्येक पांच वर्ष पर संधि के कार्यान्वयन की समीक्षा करते हैं। इसका दसवां समीक्षा सम्मेलन 2020 में आयोजित होना था जो कोविड-19 महामारी के कारण विलंबित हो गया और अब संपन्न हुआ है। सम्मेलन में आम सहमति नहीं बन सकी जो इस समयअप्रत्याशित ही मानी जा सकती है जब विश्व की कई प्रमुख शक्तियां परस्पर संघर्षरत हैं। सम्मेलन की विफलता वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ती खाई को प्रकट करती है। जबकि शीत युद्ध के चरम पर भी एनपीटी के लिए प्रबल समर्थन ऐसा प्रमुख क्षेत्र था जहां अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच सहयोग नज़र आता था।
भारत ने भी एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र होने के बावजूद एनपीटी समीक्षा में अधिक दिलचस्पी नहीं दिखाई, जबकि समय की आवश्यकता यह है कि भारत नए आयाम ग्रहण कर रहे अंतर्राष्ट्रीय परमाणु विमर्श पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दे और अपने स्वयं के असैन्य एवं सैन्य परमाणु कार्यक्रमों पर पुनर्विचार करे। भारत का परमाणु कार्यक्रम 1940 के दशक के उत्तरार्द्ध में होमी जे. भाभा के मार्गदर्शन में शुरू किया गया था। भारत ने पहला परमाणु परीक्षण मई 1974 में किया। भारत ने सैन्य उद्देश्यों के लिये परमाणु ऊर्जा का उपयोग करने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन करते हुए मई 1998 में कई परमाणु परीक्षण किए।
इन परीक्षणों के बाद भारत ने परमाणु हथियारों के ‘नो फ़र्स्ट यूज़’ के सिद्धांत को प्रतिपादित किया। इसके तहत कहा गया कि भारतीय क्षेत्र पर अथवा कहीं भी भारतीय सैन्य बलों पर परमाणु हमले के जवाब में ही परमाणु हथियार का इस्तेमाल किया जाएगा। भारत को वृहद शक्ति सैन्य रणनीति के प्रमुख साधनों के रूप में बदलते वैश्विक परमाणु विमर्श को चिह्नित करने और उसके अनुकूल बनने का प्रयास करना चाहिए। उसे अपने परमाणु हथियारों की क्षमता की जांच भी करनी चाहिए कि वह प्रतिद्वंद्वियों के बढ़ते परमाणु शस्त्रागार का मुकाबला कर सकने में सक्षम है या नहीं।
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