पीछे छूटा मानव विकास

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Edited By Amrit Vichar
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वैश्विक समाज एक के बाद एक संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है और बढ़ते अभावों व अन्यायों के जोखिम का भी सामना कर रहा है। बाधाओं के चलते अधिकतर देशों में मानव विकास पीछे की ओर जा रहा है। पिछले 32 वर्ष में पहली बार दुनिया में मानव विकास पूरी तरह ठहर गया …

वैश्विक समाज एक के बाद एक संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है और बढ़ते अभावों व अन्यायों के जोखिम का भी सामना कर रहा है। बाधाओं के चलते अधिकतर देशों में मानव विकास पीछे की ओर जा रहा है। पिछले 32 वर्ष में पहली बार दुनिया में मानव विकास पूरी तरह ठहर गया है। इसके लिए जीवन प्रत्याशा में गिरावट को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

महामारी ने भी मानव विकास को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारत ही नहीं, पूरे वैश्विक स्तर पर गिरावट जारी है। दुनिया में एक दूसरे से जुड़े अंतर्निहित संकटों ने भारत के विकास पथ को वैसे ही प्रभावित किया है जैसे दुनिया के अधिकांश हिस्सों में प्रभावित हुआ है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की ओर से जारी मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट के मुताबिक भारत 191 देशों की सूची में 132वें स्थान पर है।

चौंकाने वाला तथ्य ये है कि भारत मानव विकास के मामले में श्रीलंका, बांग्लादेश और भूटान से पीछे है। इस सूची में श्रीलंका 73वें, चीन 79वें, बांग्लादेश 129वें और भूटान 127वें नंबर पर है। जबकि पाकिस्तान 161वें, नेपाल 143वें और म्यांमार 149 वें नंबर के साथ भारत से पीछे है। इस सूची में स्विटजरलैंड, नॉर्वे और आइसलैंड शीर्ष पर हैं।

किसी राष्ट्र के स्वास्थ्य, शिक्षा और औसत आय को मापने के पैमाने की दृष्टि से मानव विकास में लगातार दो साल 2020 और 2021 में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि इससे पहले पांच साल काफी विकास हुआ था। इसकी गणना चार संकेतकों-जन्म के समय जीवन प्रत्याशा, स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष, स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष और प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) के माध्यम से की जाती है।

ध्यान रहे कि ये लक्ष्य मिलकर ही 2030 का टिकाऊ विकास एजेंडा बनाते हैं। जोकि दुनिया भर के लोगों और पृथ्वी के लिए एक बेहतर भविष्य की ख़ातिर संयुक्त राष्ट्र का एजेंडा है। कुल मिलाकर जलवायु संकट से जूझ रही दुनिया के लिए हालात और जटिल हो गए हैं। जैव विविधता को भीषण क्षति पहुंचने की स्थिति में परिस्थितियां, वैश्विक महामारी के कारण विश्व में हुई ऊठापठक से कहीं अधिक विकट होंगी। व्यापक सामाजिक और आर्थिक बदलाव, पृथ्वी के अस्तित्व से संबंधित खतरनाक परिवर्तन और ध्रुवीकरण में बेतहाशा वृद्धि का माहौल भी अपनी तरह की चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। पूरी दुनिया में अनिश्चितता का वातावरण तेजी से पांव पसार रहा है और इनसे निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को निष्क्रियता छोड़कर वैश्विक एकजुटता की भावना लानी होगी।