खतरनाक गठजोड़

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Edited By Amrit Vichar
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कानपुर में विकास दुबे गैंग द्वारा आठ पुलिस कर्मियों की हत्या के बाद पुलिस-अपराध का जैसा गठजोड़ बताया जा रहा है वह हैरान, परेशान करने वाला है। अपराध और अपराधियों की जड़ें राजनीतिक दलों से होते हुए अधिकारियों, पुलिस तक भी पहुंची होती हैं, इस पर कोई संशय नहीं है क्योंकि राजनीतिक दलों में अब …

कानपुर में विकास दुबे गैंग द्वारा आठ पुलिस कर्मियों की हत्या के बाद पुलिस-अपराध का जैसा गठजोड़ बताया जा रहा है वह हैरान, परेशान करने वाला है। अपराध और अपराधियों की जड़ें राजनीतिक दलों से होते हुए अधिकारियों, पुलिस तक भी पहुंची होती हैं, इस पर कोई संशय नहीं है क्योंकि राजनीतिक दलों में अब तक गैंगस्टर या अन्य अपराधियों का चुनाव लड़ा जाना, जीतना और सत्ता प्रतिष्ठानों पर बैठना कोई नई बात नहीं है। बल्कि कई बार तो राजनीतिक दल अपनी साख के लिए बाहुबलियों को चुनाव मैदान में उतार देते हैं।

यह सब तो जैसे अब एक परंपरा सी बन गई है, मगर विकास दुबे मामले के बाद पुलिस और अपराध के बीच जिस तरह गठजोड़ की आशंका जताई जा रही है, वह अक्षम्य है। एक ऐसा गठजोड़ जिसने पुलिस विभाग के ही एक अधिकारी समेत आठ पुलिस कर्मियों को मौत की नींद सुला दिया। उस पर भी घटना के इतना लंबा वक्त गुजर जाने के बाद पुलिस अभी विकास दुबे तक नहीं पहुंच सकी है।

इस मामले की जांच में जो बात सामने आ रही है उसके मुताबिक विकास दुबे के घर दबिश के बारे में उसे पहले ही मालूम था और पुलिस टीम की उसे पल-पल लोकेशन मिल रही थी। तथ्यों के मुताबिक उस तक यह सूचनाएं और कोई नहीं बल्कि पुलिस के लोग ही पहुंचा रहे थे। प्रदेश के पुलिस महानिदेशक भी कह चुके हैं कि इस मामले में संबंधित क्षेत्र का पूरा थाना ही संदेह के घेरे में है, अगर किसी भी कर्मी की इस कांड में किसी भी तरह की संलिप्तता पाई जाती है तो उनके खिलाफ भी हत्या का मुकदमा दर्ज होगा।

जाहिर है, मामले में कहीं तो कुछ ऐसा है जिससे पुलिस के अपने ही दामन पर गद्दारी के छींटे पड़ते दिख रहे हैं। पुलिस जिसका काम अपराधियों को पकड़कर जनता को भयमुक्त समाज देना है, अगर वही अपराधियों की इस तरह मददगार बनकर सामने आती है तो फिर यह बात मांग करती है कि पुलिस-अपराधियों के गठजोड़ को नेस्तनाबूद करने के लिए नए सिरे से अब बहुत कुछ करना होगा। इस मामले की जांच के बाद सच्चाई सामने आएगी और उम्मीद है कि सभी अपराधी सलाखों के पीछे होंगे।

मगर अफसोस इस बात का है कि पुलिस-अपराध की इस कहानी को बेपर्दा होने की कीमत भी आठ पुलिसकर्मियों ने ही अपनी जान गंवाकर चुकाई है। जिस विकास दुबे ने इतना बड़े अपराध को अंजाम दिया और 60 से ज्यादा मामलों में जिसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई थी, जिसने तत्कालीन राज्यमंत्री की सरेआम थाने में हत्या कर दी थी, उसका नाम तक संबंधित क्षेत्र के थाने में अपराधियों की सूची में शामिल नहीं था। यह बात भी पुलिस-अपराध की इसी खतरनाक गठजोड़ की तरफ इशारा करती है, जिसे जड़े से समाप्त करने के लिए गंभीरता से काम करने की जरूरत है।