बरेली: रबर फैक्ट्री का मिला 1999 का वेतन रजिस्टर, 1432 कर्मचारियों का डाटा तैयार
बरेली, अमृत विचार। लंबे संघर्ष के बाद रबर फैक्ट्री के 1432 कर्मचारियों को करीब 23 साल के बाद उनका हक मिलने की घड़ी नजदीक आ रही है। रबर फैक्ट्री का वो रजिस्टर मिल गया है जिसमें वेतन से संबंधित सभी जानकारी हर माह दर्ज होती थी। उस रजिस्टर में सितंबर 1999 तक की इंट्री है। …
बरेली, अमृत विचार। लंबे संघर्ष के बाद रबर फैक्ट्री के 1432 कर्मचारियों को करीब 23 साल के बाद उनका हक मिलने की घड़ी नजदीक आ रही है। रबर फैक्ट्री का वो रजिस्टर मिल गया है जिसमें वेतन से संबंधित सभी जानकारी हर माह दर्ज होती थी। उस रजिस्टर में सितंबर 1999 तक की इंट्री है। उसके मिलने के बाद कर्मचारियों का सही डाटा तैयार हो गया। इसके साथ कर्मचारियों की देनदारी भी असल के साथ ब्याज सहित तैयार की गई है।
करीब 400 करोड़ 30 लाख रुपये की धनराशि का हिसाब-किताब तैयार है जो कर्मचारियों को मिलना है। यह संपूर्ण डाटा लेकर रबर फैक्ट्री के एस एंड सी कर्मचारी यूनियन के महासचिव अशोक मिश्रा अपने साथ मुंबई में उच्च न्यायालय के सहायक शासकीय समापक (लिक्वीडेटर) के पास गए हैं। वह शुक्रवार को मुंबई पहुंच गए। शनिवार को संपूर्ण डाटा लिक्वीडेटर को सौंपा जाएगा।
इस डाटा पर ही सहायक शासकीय समापक (लिक्वीडेटर) के स्तर से कर्मचारियों की सही धनराशि धनराशि निर्धारित होगी। यहां से मुहर लगने के बाद बाम्बे हाईकोर्ट में विचाराधीन केस में जिस किसी को रबर फैक्ट्री की संपत्ति पर मालिकाना हक मिलेगा, वहीं कर्मचारियों की देनदारी का भुगतान भी करेगा। उसमें फिर हेरफेर की गुंजाइश भी नहीं रहेगी। फोन पर अशोक मिश्रा ने अमृत विचार को बताया कि पुराना रजिस्टर मिलने से कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है।
उस रजिस्टर में पीएफ नंबर, कर्मचारी संख्या से लेकर अन्य जानकारी भी दर्ज हैं। अब एक-एक कर्मचारी का सही तरह से डाटा तैयार हुआ है। सहायक शासकीय समापक (लिक्वीडेटर) के यहां से जो फार्म मिला है, उसमें 38 कॉलम बने हैं, जिन पर जानकारी दर्ज की गई है। 11 कर्मचारियों का डाटा नहीं मिला। उनके नाम पूर्व सूची से हटा दिए हैं।
428 कर्मचारियों के डाटा पर लगी आपत्ति दुरुस्त कराई गईं
रबड़ फैक्ट्री कर्मचारियों के देनदारियों को लेकर उच्च न्यायालय के लिक्वीडेटर मुम्बई के यहां 5 जुलाई को बैठक हुई थी। बाद में कर्मचारियों की सूची लिक्वीडेटर के यहां जमा की गई। उसमें लिक्वीडेटर ने कुछ आपत्तियां जताई थीं। सूची में एक जैसे कई नाम थे, इसके साथ अन्य त्रुटियां भी थीं। कुल 428 कर्मचारियों के व्यक्तिगत फार्म पर देर से जमा करने की आपत्ति लगाई थी। इस संबंध में 19 सितंबर को शासकीय लिक्वीडेटर मुंबई ने एक पत्र लिखा था और 21 दिन में लगाई आपत्तियों को सही कर कर्मचारियों का डाटा जमा करने का आदेश दिया है।
इस पर अशोक मिश्रा ने कर्मचारी सतीश रोहतगी, अनिल गुप्ता, अरविंद, तनय, पीएस राना, संत प्रकाश शर्मा, आरसी शर्मा, शैलेन्द्र चौबे, अजय भटनागर, हैदर नवी, सतेन्द्र सिंह, पंकज कपूर, प्रदीप कुमार, शिवाकांत के सहयोग से सभी आपत्तियों को दुरुस्त कराया। कर्मचारियों के वेतन, बोनस, ग्रेच्युटी समेत सभी की गणना विशेषज्ञ सीए से आडिट रिपोर्ट के साथ डाटा तैयार कराया। सभी कर्मचारियों के आधार कार्ड पर हस्ताक्षर कराए। इसके बाद अशोक मिश्रा और प्रमोद कुमार मुम्बई रवाना हुए।
1960 में बनी फैक्ट्री 15 जुलाई 1999 में बंद हो गई थी
रबर फैक्ट्री के लिए 1960 के दशक में मुंबई के सेठ किलाचंद को फतेहगंज पश्चिमी में 1382.23 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई गई थी। तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने 3.40 लाख रुपये लेकर जमीन लीज पर दी थी। उसमें यह शर्त शामिल की गई कि जब फैक्ट्री बंद होगी। तब सरकार जमीन वापस ले लेगी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। यह फैक्ट्री 15 जुलाई 1999 को बंद हुई थी।
12 अक्टूबर को है बाम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई
बाम्बे हाईकोर्ट में कंपनी पिटीशन संख्या 999/2020 अलकेमिस्ट एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन लिमिटेड बनाम मैसर्स सिंथेटिक एंड केमिकल्स लिमिटेड व अन्य में शासन की ओर से हस्तक्षेप आवेदन दाखिल है। राज्य सरकार के हस्तक्षेप आवेदन पर एक बार सुनवाई हाे चुकी है। इस बार 12 अक्टूबर को सुनवाई है।
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