हल्द्वानी: ‘5 मेकनाज इंफेट्री 14 कुमाऊं’ के जाबांजों ने मनाया युद्ध सम्मान दिवस, 1965 में पाकिस्तानी सेना को किया था ढेर

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संजय पाठक, हल्द्वानी। चीन से युद्ध में मिली पराजय के सदमे से अभी भारतीय सेना पूरी तरह उबरी भी नहीं थी कि उसे सितंबर, 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध लडना पड़ा। भारतीय सेना ने इस युद्ध में पाकिस्तानी फौज को करारी शिकस्त दी और गुलाम कश्मीर के कुछ हिस्से समेत पाकिस्तान के बड़े क्षेत्र …

संजय पाठक, हल्द्वानी। चीन से युद्ध में मिली पराजय के सदमे से अभी भारतीय सेना पूरी तरह उबरी भी नहीं थी कि उसे सितंबर, 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध लडना पड़ा। भारतीय सेना ने इस युद्ध में पाकिस्तानी फौज को करारी शिकस्त दी और गुलाम कश्मीर के कुछ हिस्से समेत पाकिस्तान के बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था।

14 कुमाऊं को जब मेकनाज बटालियन में परिवर्तन किया जा रहा था, उस समय बटालियन की कमान लेफ्टिनेंट कर्नल अब मेजर जनरल इंद्रजीत सिंह बोरा, विशिष्ट सेवा मेडल के सशक्त हाथों में थी।

चार ग्वालियर 14 कुमाऊं और अब पांच मैकेनाइज इंफेट्री बटालियन के जाबांजों ने भी इस युद्ध में पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे किए थे। इस युद्ध में बटालियन के 17 जवान शहीद हुए थे जबकि पाकिस्तानी सेना के 71 सैनिक ढेर हुए थे। 14 कुमाऊं को जब मेकनाज बटालियन में परिवर्तन किया जा रहा था, उस समय बटालियन की कमान लेफ्टिनेंट कर्नल अब मेजर जनरल इंद्रजीत सिंह बोरा, विशिष्ट सेवा मेडल के सशक्त हाथों में थी। आज उनके ही संरक्षण में बटालियन ने युद्ध सम्मान दिवस मनाया।

लोकवाद्यों पर थिरकते गौरव सेनानी और परिजन।

हल्द्वानी के पनचक्की चौराहे के पास आयोजित कार्यक्रम में 1965 युद्व में शहीद हुए वीरों के परिजनों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर तमाम पूर्व सैनिक और वीरांगनाओं ने नम आंखों से शहीदों को याद किया। कार्यक्रम के दौरान कुमाऊंनी संस्कृति के अद्भुत रंगों में पूर्व सैनिक और उनके परिजन सराबोर नजर आए। हुड़का, मशकबीन, ढोल और दमाऊ की मंत्रमुग्ध करने वाली धुन के बीच वीर सैनिकों ने झमकर ठुमके भी लगाए। इस दौरान माहौल देशभक्ति और लोक संस्कृति के रंग से सराबोर हो गया। अमृत विचार से खास बातचीत में शहीदों के परिजनों की आंखें भी छलक आईं।

शहीद पिता हवलदार गिरधर चंद को याद कर बेटी पुष्पा चंद की आंखें भर आईं।

बताते चलें कि भारतीय सेना की पुरानी बटालियनों में से एक महान बटालियन है 5 मेकनाइज बटालियन। इस बटालियन का इतिहास भी बहुत पुराना है, आजादी से पहले यह ग्वालियर स्टेट की सेना की चौथी बटालियन थी। आजादी से पहले जितने भी निर्णायक युद्ध हुए इस बटालियन ने सक्रिय भाग लिया और एक गरिमामय इतिहास अंकित किया। आजादी के बाद जब सभी राज्यों को राष्ट्र में विलय किया गया तो उसके बाद राज्यों की सेनाओं को भी भारतीय सेना में विलय किया गया। कुमाऊं रेजिमेंट में मध्य भारत की दो बटालियनों का विलय किया गया। ग्वालियर स्टेट की चार ग्वालियर और इंदौर इंफेट्री, जो कुमाऊं रेजिमेंट में 14 और 15 कुमाऊं बनी। 1953 में इन दोनों बटालियनों का कुमाऊं रेजिमेंट में विलय किया गया और विधिवत रूप से 27 अक्टूबर 1954 को कुमाऊं दिवस को इन्हें कुमाऊं रेजिमेंट का ध्वज प्रदान किया गया और रेजिमेंट का हिस्सा बने। चार ग्वालियर का कुमाऊं रेजिमेंट में विलय होने पर अपनी परंपरा कायम रखी और 14 कुमाऊं चार ग्वालियर के नाम से जानी जाती थी।

शहीद ताउजी अन राम जी की शहादत पर गर्व का अनुभव करते पूर्व सूबेदार भतीजे रमेश राम।

देश की आजादी के बाद के सभी युद्ध में बटालियन ने सक्रिय रूप से भाग लिया। 29 सितम्बर 1965 को बटालियन को जम्मू कश्मीर के नौशेरा क्षेत्र में तैनात किया गया, तथा लाम घाटी में सर्च और क्लीनिंग का टास्क दिया गया। इस ऑपरेशन में बटालियन के साथ केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल की कंपनी भी थी। बटालियन ने बकरवालों के भेष में बहुत अधिक संख्या मे पाकिस्तानी घुसपैठियों को पकड़ा और देश को होनी वाले संभावित खतरे से बचाया। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए बटालियन को सात अक्टूबर ओपी हिल युद्ध सम्मान दिवस के रूप में प्रदान किया गया। ऑपरेशन सफलता से संपन्न करने के बाद बटालियन को 18 अक्टूबर को वहां से पूंछ भेजा गया। उसके बाद जब भारतीय सेना में बदलाव शुरू हुए तो मेकनाज इंफेट्री की स्थापना की गई। इस पर कुमाऊं रेजिमेंट से 14 कुमाऊं को चुना गया और 14 कुमाऊं अब 5 मेकानाज इंफेट्री मे परिवर्तन हो गई। लेकिन बटालियन ने कुमाऊं रेजिमेंट से अपना लगाव बनाए रखा और आज बटालियन पांच मेकनाज इंफेट्री 14 कुमाऊं के नाम से जानी जाती है।

सम्मान समारोह के दौरान जिला पूर्व सैनिक लीग के अध्यक्ष मेजर बीएस रौतेला, कैप्टन नैन सिंह रौतेला, 1965 युद्ध में शहीद हवलदार गिरधर चंद की बेटी पुष्पा चंद, शहीद सिपाही अन राम के भतीजे रमेश राम समेत गौरव सैनानी और परिजन मौजूद रहे।

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