हल्द्वानी: सालों तक पूछती रही पिताजी कब आएंगे.. फिर मां बोली वो शहीद हो गए
संजय पाठक, हल्द्वानी। 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते हुए जब पिताजी शहीद हुए थे तब मैं एक साल की थी। बड़ा भाई तीन साल और छोटा भाई मां के पेट में था। मुझे अच्छे से याद है कि मां ने कितने संघर्षों से हमें पाला पोसा। मां बताती थीं कि पिता की शहादत के …
संजय पाठक, हल्द्वानी। 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते हुए जब पिताजी शहीद हुए थे तब मैं एक साल की थी। बड़ा भाई तीन साल और छोटा भाई मां के पेट में था। मुझे अच्छे से याद है कि मां ने कितने संघर्षों से हमें पाला पोसा। मां बताती थीं कि पिता की शहादत के कई साल बाद 500 रुपये मिले। फिर मामूली पेंशन से मां ने हम बच्चों को पढ़ाया लिखाया। अब दोनों भाई भी दुनिया छोड़ चुके हैं और उनके बच्चे आज भी बेरोजगार हैं… इतना कहते ही शहीद हवलदार गिरधर चंद की बेटी पुष्पा चंद फफक फफक कर रो पड़ीं।

‘5 मेकनाज इंफेट्री 14 कुमाऊं’ की ओर से आयोजित 1965 युद्ध सम्मान दिवस में पुष्पा चंद को सम्मानित किया गया। अमृत विचार से खास बातचीत में पिथौरागढ़ निवासी पुष्पा चंद ने बताया कि बचपन में जब भी मां से पूछती थीं कि पिताजी कब आएंगे तो मां कहती थी कि वो देशसेवा में गए हैं, 15 अगस्त को आएंगे। कई साल तक मां इसी तरह हम बच्चों को बहलाती रहीं फिर एक दिन मां ने बता ही दिया कि अब पिताजी कभी नहीं आएंगे, उन्हें भारत मां ने अपने पास बुला लिया है। पुष्पा कहतीं हैं कि उन्हें आज पहली बार किसी सम्मान समारोह में शहीद पिता की वजह से सम्मानित किया गया है। लेकिन इस सम्मान की असली हकदार मेरी मां बेलमती चंद हैं जिन्होंने पिता बनकर हम बच्चों को जीना सिखाया। इस मौके पर पोता पियूष, बड़ी बहू यमुना चंद और छोटी बहू भुवनेश्वरी चंद भी साथ रहीं।

वहीं, 1965 की लड़ाई में शहीद हुए सिपाही अन राम की शहादत के लिए उनके रुद्रपुर निवासी भतीजे पूर्व सूबेदार रमेश राम को भी सम्मानित किया गया। रमेश राम ने बताया कि ताउजी को देखने का सौभाग्य भले ही नहीं मिला लेकिन दादी और पिता की जुबानी उनके देशभक्ति के जज्बे की कहानी जरुर सुनीं। दादी बताती थीं कि सेना में जाने से पहले ताउजी कहा करते थे कि मां भारती की सेवा से बड़ी कोई सेवा नहीं। आज शहीद ताउजी की वजह से हमें सम्मान मिल रहा है यह पूरे परिवार के लिए गर्व की बात है।

बताते चलें कि चार ग्वालियर 14 कुमाऊं और अब पांच मैकेनाइज इंफेट्री बटालियन के जाबांजों ने 1965 युद्ध में पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे किए थे। इस युद्ध में बटालियन के 17 जवान शहीद हुए थे जबकि पाकिस्तानी सेना के 71 सैनिक ढेर हुए थे। 14 कुमाऊं को जब मैकेनाइज बटालियन में परिवर्तन किया जा रहा था, उस समय बटालियन की कमान लेफ्टिनेंट कर्नल अब मेजर जनरल इंद्रजीत सिंह बोरा, विशिष्ट सेवा मेडल के सशक्त हाथों में थीं। शुक्रवार को उनके ही संरक्षण में बटालियन ने युद्ध सम्मान दिवस मनाया गया।
