समाज की जिम्मेदारी
मध्य प्रदेश में उज्जैन के महाकाल मंदिर के बाहर पकड़ा गया दुर्दांत विकास दुबे शुक्रवार को कानपुर में उत्तर प्रदेश एसटीएफ के साथ मुठभेड़ में ढेर हो गया। इसके साथ ही बहुत से रहस्य, रहस्य ही रह गए कि आखिर कौन-कौन विकास दुबे की पीठ पर हाथ रखे हुए थे। बहुत सी बातें अब कभी …
मध्य प्रदेश में उज्जैन के महाकाल मंदिर के बाहर पकड़ा गया दुर्दांत विकास दुबे शुक्रवार को कानपुर में उत्तर प्रदेश एसटीएफ के साथ मुठभेड़ में ढेर हो गया। इसके साथ ही बहुत से रहस्य, रहस्य ही रह गए कि आखिर कौन-कौन विकास दुबे की पीठ पर हाथ रखे हुए थे। बहुत सी बातें अब कभी सामने नहीं आएंगी । कैसे बचता रहा बरसों से ? क्या दूसरे अपराधी इससे सबक लेंगे ? नरोत्तम मिश्र और विकास दुबे में क्या कोई कनेक्शन था ? कैसे सरकारी गाड़ी विकास के घर मिली?
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि मुठभेड़ से पहले कार नहीं पलटी बल्कि सरकार पलटने से बचाई गई। अखिलेश ने यह भी पूछा कि यह आत्मसमर्पण था या नाटक ? प्रियंका गांधी कह रही हैं कि अपराधी का अंत हो गया, अपराध और उसको संरक्षण देने वाले लोगों का क्या होगा। खैर जो भी हो विकास दुबे जैसे गैंगस्टर पर काहे का रोना ? इससे तो सबक मिलना चाहिए।
देखा जाए तो आम जनों के बीच से ही सत्ता, व्यापार और कानून का अनैतिक गठजोड़ किसी को दबंग बनाता है। विकास दुबे जैसे लोग ऐसे ही अनैतिक गठजोड़ की पैदाइश होते हैं। तभी तो उसने पुलिस थाने में संतोष को पुलिसकर्मियों के सामने मार गिराया था लेकिन किसी पुलिस वाले ने गवाही नहीं दी। इसलिए विकास बरी हो गया। आखिर उसी विकास के हौंसले इतने बढ़े कि आठ पुलिसकर्मियों को ही मौत के घाट उतारने में कोई हिचक नहीं की।
सत्ता और अपराध के गठजोड़ पर जितनी चिंता व्यक्त की गई, राजनीति के अपराधीकरण या अपराध के राजनीतिकरण को लेकर जितना मंथन किया गया, उतना ही अधिक समाज में विकास दुबे जैसे लोगों का जहर फैलता गया। दुख इस बात का है कि अब भी इस जहर का इलाज ढूंढने में समाज और सत्ता की दिलचस्पी नजर नहीं आ रही है। शायद अधिकतर लोग यह मान चुके हैं कि राजनीति में बाहुबलियों का साथ जरूरी है और बाहुबली अपने राजनीतिक रसूख के बूते प्रशासन को जूते की नोंक पर रखना चाहते हैं।
सत्ता या सरकार किसी की भी रही हो, राजनेताओं के बीच माफिया अपनी पैठ बनाए रखता है। नैतिक मूल्य कितनी तेजी के साथ गिर रहे हैं, इस पर विमर्श होते थे। लेकिन अब इस तरह की दो-चार बातें सोशल मीडिया पर हो जाती हैं और समाज की जिम्मेदारी वहीं खत्म हो जाती है।
