जलवायु वित्त लक्ष्य

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Edited By Amrit Vichar
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दुनिया कई तरह की समस्याओं का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पहले से ही विनाशकारी रहे हैं। इससे जलवायु खतरों के बढ़ने के साथ छोटे किसानों की पैदावार सीमित होने से खाद्य सुरक्षा और अधिक खतरे में पड़ेगी। इसी के चलते भारत ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन (कॉप27) में 2024 तक नए वैश्विक जलवायु वित्त लक्ष्य को प्राप्त करने पर जोर दिया है।

जलवायु वित्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रतिकूल प्रभावों के अनुकूल होने और बदलती जलवायु के प्रभावों को कम करने के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न मुद्दों से निपटने और पूर्व-औद्योगिक स्तरों पर पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे तक सीमित करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जलवायु वित्त महत्वपूर्ण है।

भारत जलवायु वित्त की परिभाषा पर भी स्पष्टता चाहता है कि जलवायु वित्तपोषण को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। कोपेनहेगन में कॉप-15 में विकसित देशों ने ग्लोबल वार्मिंग में अपनी ज़िम्मेदारी को स्वीकार करते हुए विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करने के लिए 2020 तक प्रतिवर्ष 100 अरब डालर मदद के लिए प्रतिबद्धता जताई थी।

हालांकि अमीर देश इस वित्तीय सहायता को मुहैया कराने में विफल रहे हैं। मिस्र के शर्म अल-शेख में चल रहे कॉप 27 में जलवायु वित्त एक बार फिर प्रमुख विषय है। सम्मेलन के जरिए विकसित देशों से विकासशील देशों को अपनी जलवायु योजनाओं को और तेज करने के लिए प्रेरित करने की उम्मीद है। सभी देशों को सैद्धांतिक रूप से समान मानदंडों के अनुसार जलवायु वित्त की समीक्षा करके उसे पारदर्शी बनाना होगा। विकसित देशों को यह दिखाना होगा कि वे अपने वादों को निभाने के लिए तैयार हैं।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के अनुसार, 2020 में अब तक का अधिकतम स्तर 82 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया था। इस बीच यह स्पष्ट हो गया है कि वास्तविकता और वादे कितने अलग-अलग होते हैं। अब विकसित देशों को विकासशील देशों की सहायता करनी चाहिए और उन्हें स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में मदद हेतु काम करना चाहिए।

इस प्रकार जलवायु बुनियादी ढांचे के लिए वित्तपोषण प्राप्त करना चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि पूर्व में निर्धारित 100 अरब डॉलर का लक्ष्य पूरा हो। इसके अलावा नया वित्त जुटाने के लिए एक राजनीतिक प्रतिबद्धता बनाए रखने की आवश्यकता है। साथ ही जलवायु वित्त में पर्याप्त वृद्धि की आवश्यकता है।