नैनीताल: हिमालयी क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन का बुरा असर
संतोष बोरा, नैनीताल। जलवायु परिवर्तन का गहरा असर हिमालयी क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। मानसून में होने वाली बारिश में गिरावट आ गई है। ऋतुएं एक माह आगे जा खिसकी हैं। उपजों के समय पर अंतर आ गया है। ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा असर हिमालय क्षेत्र में देखने को मिला है।
मौसम के जानकार स्थानीय नागरिक रमेश चंद्रा का कहना है कि वाहनों की अत्यधिक वृद्धि से कार्बनिक कणों की मात्रा पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ गई है। जिस कारण एक तरफ जहां दिन के तापमान में तेजी से वृद्धि हो रही है तो रात का तापमान में उतनी ही तेजी से गिरावट आ रही है। इससे तापमान का स्तर काफी हद तक अनियंत्रित हो चुका है। वहीं, सूर्य की रोशनी पड़ती है तो गर्मी का आभास बढ़ जाता है और तापमान बढ़ जाता है। जब बादल छाते हैं तो कार्बनिक कण ठंडे हो जाते हैं जिसके चलते तापमान में भी गिरावट आ जाती है। शीतकाल में सूखी ठंड में तापमान माइनस डिग्री तक पहुंच जाता है।
असर फूलों और फलों पर भी
जलवायु परिवर्तन का असर फूलों और फलों पर भी पड़ने लगा है। पतझड़ जो पहले अक्टूबर में हो जाता था। वहीं, अब नवंबर, दिसंबर में हो रहा है। यह सभी परिवर्तन बीते 10 वर्षों के अंतराल में देखने को मिले है। इतना ही नहीं, पिछले 100 साल के अंतराल में नैनीताल के औसत तापमान में दस डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है, जिसके चलते नैनीताल के मौसम में भारी अंतर आया है। यहां हिमपात के साथ बारिश में भी गिरावट आई है।
मौसम का पूर्वाानुमान लगाना भी कठिन
मौसम विज्ञान केंद्र जीआईसी, नैनीताल के अनुसार बीते वर्ष नवंबर के पहले पखवाड़े में औसत तापमान 17 डिग्री सेल्सियस रहा था, जबकि इस वर्ष 1 डिग्री सेल्सियस की गिरावट आई है। इसके चलते बीते वर्ष के मुताबिक इस वर्ष नवंबर माह में ठंड में बढ़ोतरी हुई है । आने वाले दिनों में सूखी ठंड अधिक बढ़ सकती है जबकि बर्फबारी पश्चिमी विक्षोभ पर निर्भर करेगी। पश्चिमी विक्षोभ अधिक उठेंगे तो हिमपात भी उतना ही अधिक मात्रा में होगा। बहरहाल अब मौसम अनिश्चित हो चुका है, जिस कारण मौसम का पूर्वानुमान लगाना आसान नहीं रह गया है।
क्या कहते हैं पर्यावरण वैज्ञानिक
एरीज के पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में वाहनों की अत्यधिक वृद्धि से वायुमंडल को बहुत नुकसान पहुंचा है। इसका असर हिमालयी क्षेत्रों में देखने को मिला है। हिमालय में दो वर्ष पूर्व हुए शोध में 30 फ़ीसदी कार्बन की मात्रा बढ़ गई थी। हिमालयी क्षेत्रों के तापमान में असमय वृद्धि हुई है, जिसका असर यहां की जलवायु, उपज, पर्यटन और सामाजिक क्षेत्र में पड़ा है। यदि समय रहते कार्बनिक गैसों की बढ़ती रफ्तार पर अंकुश नहीं लगाया गया तो भविष्य में मौसम की भारी दुश्वारियां झेलनी पड़ सकती हैं।
