नई चुनौती

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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आतंकवाद के तेजी से विस्तार के पीछे तकनीक की ताकत काम कर रही है। आज साइबर दुनिया में नई-नई तकनीक की मदद से आतंकवादी गतिविधियों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार हो रहा है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद निरोधक समिति की भारत में हुई दो-दिवसीय विशेष बैठक में सदस्य देशों ने आतंक के डिजिटल रूपों की रोकथाम व उनसे निपटने के लिये प्रतिबद्धता व्यक्त की।

विशेष रूप से आतंकी गुटों द्वारा ड्रोन के प्रयोग सोशल मीडिया व ऑनलाइन धन उगाही से उपजे खतरों पर पार पाने के लिए। इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरस ने कहा कि डिजिटल जगत में सभी मानवाधिकारों की रक्षा के संकल्प के साथ कमजोरियों से निपटने के लिए ठोस उपाय करने होंगे। आतंकवाद से निपटते समय मानवाधिकारों का सम्मान भी सुनिश्चित करना होगा।

इंटरनेट की कई सुविधाएं ऐसी हैं जिन्होंने आतंकी संगठनों के काम को आसान बना दिया है। तकनीक की मदद से सीरिया में बैठे इस्लामिक स्टेट के लड़ाके या प्रचारक आसानी से भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश में मौजूद अपने समर्थकों से संपर्क कर सकते हैं। सऊदी अरब या पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठन नई तकनीक की मदद से दूर-दूर से अपने लिए पैसे जुटा सकते हैं।

इंटरनेट से मिलने वाली ऐसी सहूलियतों का आतंकी संगठन भरपूर फायदा उठा रहे हैं। वो इनके ज़रिए नए-नए लोगों को अपने साथ जोड़ लेते हैं और अपने संगठन का विस्तार करते हैं। सुरक्षा एजेंसियों के लिए डिजिटल दुनिया के माध्यम वाट्सऐप, फेसबुक, टेलीग्राम बहुत बड़ी चुनौती बन गए हैं। इसके माध्यम से आतंकी सीरिया और दुनिया के दूसरे हिस्सों में मौजूद आइएसआइएस अलकायदा और अन्य आतंकी संगठनों से जुड़ गए हैं। 

 डिजिटल इंडिया के सामने डिजिटल आतंकवाद नई चुनौती लेकर आया है। तकनीकी दुनिया पर नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कई बार जरूरी हो जाता है। मगर साइबर दुनिया की आज़ादी के समर्थक इसे अपनी स्वतंत्रता में बाधा मानने लगते हैं। समय के साथ इन दोनों के बीच सही तालमेल बनाना जरूरी है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि डिजिटल इंडिया भारत की तकदीर बदलेगा।

साथ-साथ दुरुपयोग को रोकने का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। हालांकि डिजिटल तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करने की कोशिश की जा रही है। दुनिया में तमाम देश डिजिटल आतंक से उपजने वाली नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बदलती आवश्यकताओं के अनुसार, वैश्विक नीति-निर्माता समुदाय को भविष्योन्मुखी बनना होगा और रचनात्मक सहयोग के साथ आगे बढ़ना होगा।