महत्वाकांक्षी समझौता

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Edited By Amrit Vichar
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जलवायु परिवर्तन, भूमंडलीय तापमान, जंगलों में आग लगना, पहाड़ों पर भूस्खलन और तूफान के कारण हो रहे मौसम में दीर्घकालीन बदलाव वैश्विक चिंता

जलवायु परिवर्तन, भूमंडलीय तापमान, जंगलों में आग लगना, पहाड़ों पर भूस्खलन और तूफान के कारण हो रहे मौसम में दीर्घकालीन बदलाव वैश्विक चिंता के गंभीर विषय हैं। इसी वैश्विक समस्या को लेकर मिस्र में संयुक्त राष्ट्र का वर्षिक जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप 27) का समापन रविवार को हानि एवं क्षतिसमझौते के साथ हो गया।

सम्मेलन कई मामलों में ऐतिहासिक रहा। कॉप-27 में सबसे विवादास्पद मुद्दे विकासशील देशों को मुआवजा देने के लिए आपदा कोष के गठन पर सहमति बन गई है। हानि और क्षति का तात्पर्य जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं से होने वाला विनाश है। इस कोष से जलवायु परिवर्तन से विकासशील देशों को हुए नुकसान की भरपाई करने में मदद की जाएगी। दुनिया इसके लिए लंबे समय से इंतजार कर रही है।

भारत ने विकासशील देशों के अगुवा के तौर पर भूमिका निभाई। साथ ही कार्बन उत्सर्जन के लिए विकासशील देशों को जिम्मेदार ठहराने की विकसित देशों की योजना पर पानी फेर दिया। भारत के इस प्रयास से चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका, नेपाल व भूटान जैसे देश भी प्रसन्न नजर आए। दरअसल विकसित देश कॉप-27 में कार्बन डाइऑक्साइड के शीर्ष 20 उत्सर्जकों पर ध्यान केंद्रित करना चाह रहे थे। चूंकि अमीर देश अपनी जीवन शैली में बदलाव करके उत्सर्जन कम नहीं करना चाहते लेकिन भारत ने उनके इन प्रयासों को सफल नहीं होने दिया।

जानकारों का कहना हैकि 2015 में पेरिस समझौता (कॉप-21 ) हुआ था। जिसमें कहा गया था कि सदी के अंत तक दुनिया को दो डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक गर्म नहीं होने दिया जा सकता है, और जहां तक संभव हो, इसे 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक सीमित किया जाना चाहिए।

नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लासगो सम्मेलन के समय कहा था कि भारत 2070 तक शुद्ध शून्यया कार्बन तटस्थ होगा। भारत घरेलू स्तर पर भी, 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से बिजली का उत्पादन आधा करने के लिए प्रतिबद्ध ह। भारत नवीकरणीय ऊर्जा पर टिके भविष्य के लिए और पर्याप्त रूप से प्रतिबद्ध है।

हानि एवं क्षति समझौता होने के बाद विकासशील देशों की उम्मीद जगी है। फिर भी जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल बंद करने के भारत के आह्वान समेत अन्य अहम मुद्दों पर सहमति न बन पाना चिंता की बात है। इसके लिए सभी पक्षों को प्रयासों में तेज़ी लाकर जीवाश्म ईंधन पर दी जाने वाली सब्सिडी को तर्कसंगत रूप प्रदान किए जाने और 2023 तक नई जलवायु कार्रवाई राष्ट्रीय योजनाओं को प्रस्तुत किए जाने की जरूरत ह।