जीएम सरसों का परीक्षण
सरकार का देश में जेनेटिकली मॉडिफाइड मस्टर्ड यानी सरसों की खेती को मंजूरी देना एक बड़ा फैसला था। इसके समर्थन और विरोध में शुरु से ही आवाजें उठने लगीं। अब उच्चतम न्यायालय ने सरकार से पूछा है कि इसके परीक्षण की मंजूरी के पीछे क्या कोई बाध्यकारी कारण हैं? याचिका में फूल आने से पहले पौध नष्ट करने की मांग की गई।
सरकार ने कहा कि देश में सरसों का उत्पादन दोगुना करना है जिसके लिए पैदावार बढ़ाने के लिए हाईब्रिड फसलों की जरूरत है। किसानों की क्षमता और स्वदेशी जर्मप्लाज्म के दूषित होने का झूठा डर फैलाया जा रहा है। जबकि इसके बीज में कीट से लड़ने की भी क्षमता है, इसलिए इससे उत्पादन में सुधार और लागत खर्च में कमी आएगी।
सरकार की ओर से वैज्ञानिक भले ही यह आश्वस्त कर रहे हैं कि जीएम सरसों से मधुमक्खी, परागण करने वाले अन्य कीट और मिट्टी में मौजूद जीवाणु को कोई खतरा नहीं है लेकिन कुछ वैज्ञानिक इसको लेकर संदेह जता रहे हैं।
आनुवांशिक रूप से संशोधित उत्पादों के लिए नियामक आनुवांशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) से जीएम सरसों के क्षेत्र परीक्षण की इजाजत मिलने के एक सप्ताह के भीतर मंत्रालय ने इसे मंजूरी दे दी तथा इसके सार्वजनिक होने से पहले ही क्षेत्र परीक्षण शुरू करने का निर्णय ले लिया गया।
इसके बाद विरोध करने के लिए किसान समूह, शोधकर्ता व एक्टिविस्ट कोलिशन फॉर ए जीएम-फ्री इंडिया के बैनर के नीचे एकजुट हो गए और जीएम-सरसों को मंजूरी मिलने के खिलाफ उन्होंने 2 नवंबर को शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया।
आईसीएआर ने क्षेत्र परीक्षण रोक दिया। भारत में कुल खाद्य तेल के उत्पादन में सरसों की भागीदारी 40 प्रतिशत है। वहीं, सोयाबीन और मूंगफली की भागीदारी क्रमशः 18 और 15 प्रतिशत है। देश में खाद्य तेल का उत्पादन मांग के मुकाबले 55-60 प्रतिशत कम होता है। पिछले साल भारत ने घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए 133.5 लाख टन तेल का आयात किया, जिसके लिए देश के खजाने से 1,17,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े।
इसलिए भारत को खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बनाना बहुत जरूरी है। जीएम सरसों के इस्तेमाल से देश खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बनेगा। उधर मधुमक्खी पालकों का कहना है कि सरसों ही एकमात्र प्राकृतिक फसल है, जिस पर मधुमक्खी पालक निर्भर हैं। अगर जीएम सरसों को व्यावसायिक खेती में शामिल कर लिया जाता है, तो शहद उत्पादन में गिरावट आएगी।
अदालत ने भी कहा है कि इसकी मंजूरी से पहले सभी एहतियाती उपाय किए जाने चाहिए। पर्यावरणीय मंजूरी के असर के बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है। इसलिए खुले पर्यावरण के बजाय नियंत्रित ग्रीन हाउस में परीक्षण पर विचार किया जा सकता है।
