संतोष की बात
देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 6.3 प्रतिशत की यह बढ़ोतरी दर दूसरी तिमाही यानी जुलाई-सितंबर के दौरान की है। चूंकि अप्रैल-जून तिमाही की आर्थिक विकास दर की तुलना में यह आधी है, इसलिए विकास दर के ये आंकड़े उत्साहजनक नहीं कहे जा सकते।
संतोष की बात है कि भारत की तुलना में चीन, अमरीका, जापान और जर्मनी जैसे विकसित देशों की विकास दर आधी अथवा उससे भी कम है। राष्ट्रीय सांख्यिकी विभाग ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उनके मुताबिक, जीडीपी वृद्धि दर में सुस्ती का माहौल है, तब भी विकास दर बढ़ती जा रही है। हम कोरोना महामारी के दुष्प्रभावों से निजात पा रहे हैं और दुनिया में सबसे तेज उभार हमारी अर्थव्यवस्था में है।
महत्वपूर्ण यह है कि आर्थिक विकास दर की हकीकत भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अनुमान के अनुरूप ही है। उधर खुदरा मुद्रास्फीति में नरमी के संकेतों और वृद्धि को बढ़ावा देने की जरूरत को देखते हुए आरबीआई बुधवार को अपनी आगामी मौद्रिक नीति की समीक्षा में दरों में वृद्धि को लेकर नरम रुख अपना सकता है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि ब्याज दरों में लगातार तीन बार 0.50 प्रतिशत की वृद्धि करने के बाद अब केंद्रीय बैंक इस बार ब्याज दरों में 0.25 से 0.35 प्रतिशत की वृद्धि कर सकता है। आरबीआई मौद्रिक नीति तय करते वक्त उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर प्रमुख रूप से गौर करता है। एमपीसी को पहले यह बढ़ोतरी इसलिए करनी पड़ी थी कि महंगाई लगातार उसके तय दायरे के बाहर बनी हुई थी।
ताजा आंकड़ों में जिस तरह औद्योगिक क्षेत्र का प्रदर्शन निराशाजनक दर्ज हुआ है, उसके मद्देनजर सरकार को बहुत कुछ करने की जरूरत है। विनिर्माण और खनन क्षेत्र में भारी गिरावट दर्ज हुई है। इसकी वजह महंगाई बताई जा रही है। विनिर्माण क्षेत्र रोजगार सृजन का प्रमुख क्षेत्र भी है और देश की खपत को प्रभावित करता है।
विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादन दर में 4.3 फीसद की गिरावट आई है, जबकि पिछले साल की इसी अवधि में इसमें 5.6 फीसद की वृद्धि दर्ज हुई थी। देश के कृषि क्षेत्र में 4.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कृषि क्षेत्र में यह वृद्धि वैश्विक प्रतिकूलताओं के बावजूद हुई है, जिन्होंने पूरी दुनिया के विकास को धीमा कर दिया है।
इसमें रूस-यूक्रेन युद्ध की भी बड़ी भूमिका है। बहरहाल कृषि क्षेत्र से जुड़े उद्योगों में पूंजी निवेश बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को गति दी जा सकती है। साथ ही सरकार को महंगाई के स्तर पर नियंत्रण के लिए अतिरिक्त प्रयास करने की जरूरत है।
