सीएए बिल पर संसद में रार
बीतें दिनों राज्यसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक (सीएए) बिल पेश करने को लेकर भारी हंगामा हुआ। बिल सरकार की तरफ से पेश नहीं किया गया था बल्कि भाजपा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने निजी तौर पर पेश किया। निजी विधेयक का जिस तरह विरोध किया गया उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। साथ ही विपक्ष के इस आरोप को भी सहमति मिलना मुश्किल है कि सीएए सम्मत नहीं है। संविधान में भाग चार के अनुच्छेद 44 में स्पष्ट है कि सीएए लागू करना हमारा लक्ष्य होगा।
इसके अलावा उच्च और सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार केंद्र से इस दिशा में बढ़ने की बात कह चुका है। इसलिए विपक्ष का यह कहना कि सीएए का विचार धर्मनिरपेक्ष ढांचे के खिलाफ है तथा इससे सामाजिक तानाबाना प्रभावित होगा। वैसे ही शरारतपूर्ण तर्क हैं जैसे पहले भी सीएए को लेकर दिए गए थे और अब धर्मांतरण विरोधी क़ानून की संभावना पर दिए जा रहे हैं। बहरहाल किरोड़ी लाल मीणा के निजी विधेयक के विरोध का फिलवक्त कोई औचित्य नहीं था क्योंकि निजी विधेयक रखना किसी भी सांसद का अधिकार है और ऐसे विधेयक पहले भी रखे जाते रहे हैं। यह अलग बात है कि वे किसी मुकाम पर पहुंचने से पहले ही लापता हो जाते हैं।
सीएए का मुद्दा भाजपा पहले से उठाती आ रही है। गुजरात चुनाव में तमाम वादों में समान नागरिकता भी शामिल रही। उत्तराखंड और यूपी में यूसीसी लागू करने की कोशिश जारी है। देश में एक संविधान और एक विधान की भी मांग बहुत पहले से उठती रही है। इसलिए बिल को असंवैधानिक बताना ही संविधान का विरोध है। यह तर्क भी निरर्थक है कि किसी धर्म में होने वाली शादी की परंपराओं पर इसका असर पड़ेगा। किस महजब में शादी कैसे होती है उनसे इस बिल का कोई लेना देना नहीं।
बिल का धार्मिक परंपराओं से छेड़छाड़ का कोई इरादा नहीं है। इससे पर्सनल लॉ या अन्य धार्मिक समूहों के धार्मिक क़ानून समाप्त हो जाएंगे। साथ ही समानता की धारणा को बल मिलेगा और सही अर्थों में विविधता में एकता की भावना साकार रूप ले सकेगी। अलबत्ता सरकार को चाहिए कि वह विभिन्न मंचों से इस विषय में जनता को जागरूक करे ताकि इसको लेकर फैलाई जा रही भ्रांतियों पर विराम लग सके। अधिक अच्छा तो यह है कि सरकार एक प्रारूप जनता के सामने रखे जिससे व्यापक बहस के द्वार खुलेंगे और स्वतः ही सीएए के लिए जमीन बन सकेगी।
