मतांतरण पर रोक जरूरी
देश में एक बार फिर मतांतरण का मुद्दा सतह पर आ गया है। इस महीने संभवत: यह तीसरा मौका है जब मतांतरण के विरोध और समर्थन दोनों पर बहस छिड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मतांतरण को राष्ट्र की सुरक्षा के लिए चुनौती के रूप में रेखांकित कर केंद्र से जवाब मांगा है। वस्तुतः यह मामला आजादी से पहले से उठता रहा है। गांधी जी ने भी हरिजन में अपने लेख और सभाओं में संभाषण के दौरान इस मुद्दे पर वही कहा था जो आज सुप्रीम कोर्ट कह रहा है। शब्दों में फेरबदल हो सकता है लेकिन निष्कर्ष दोनों का एक है।
गांधी जी मानते थे कि मतांतरण राष्ट्रांतरण है। कोर्ट भी मानता है कि यह राष्ट्र के लिए खतरनाक है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर केंद्र सरकार से इस पर कानून बनाने की बात कही जाती रही है लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए जा सके हैं। हाल ही में उच्चतम न्यायालय में अश्वनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई कर रही पीठ के सामने भी इस मुद्दे पर कानून न होने तथा आर्थिक रुप से पिछड़े नागरिकों का अनैतिक तरीके से मतांतरण कराए जाने की बात कही गई।
याचिका में आगे कहा कि विदेशी फंडिंग के जरिए महिलाएं व बच्चे मतांतरण के अधिक शिकार हो रहे हैं और इस पर एक प्रभावी कानून बनाया जाना चाहिए। इसलिए और भी जरूरी है क्योंकि पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और भूटान में इसे लेकर कानून है। बावजूद इस दिशा में सरकार का आगे न बढ़ना समझ से परे है। इस का एक कारण वोटबैंक की राजनीति भी है जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इसका लंबे समय से विरोध करती आ रही है। यह विरोध राष्ट्र के लिए ठीक नहीं।
इसके चलते कई राज्यों के कई जिलों में जनसंख्या असंतुलन का खतरा पैदा हो गया है। कुछ जगह तो यह असंतुलन हो भी चुका है। हालांकि उत्तर प्रदेश समेत नौ प्रदेशों में कानून बनाए गए हैं लेकिन उनका जमीन पर कोई प्रभाव या खौफ नजर नहीं आता। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि यूपी में दो साल में 291 मामले पंजीकृत हुए और लगभग साढ़े पांच सौ लोगों को गिरफ्तार भीकिया गया।
इस सबको देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि मतांतरण विरोधी क़ानून को शीघ्र लाया जाए और उसे कड़ाई से लागू भी किया जाए। अन्यथा भविष्य में घातक परिणाम निकल सकते हैं। मतांतरण जैसा कृत्य न सिर्फ समाज विरुद्ध बल्कि संविधान व लोकतंत्र की भावना को भी आहत करता है।
