गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा जिम्मेदारी
केन्द्र सरकार लंबे समय से शिक्षा प्रणाली को बदलना चाहती थी। नई शिक्षा नीति देखकर यही लग रहा है कि सरकार ने राजनीतिक मध्यमार्ग अपनाया है। हर बच्चे को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है। नई शिक्षा नीति में स्पष्ट नहीं है कि सरकारी शिक्षा प्रणाली को कैसे बेहतर किया जाएगा। बच्चों को …
केन्द्र सरकार लंबे समय से शिक्षा प्रणाली को बदलना चाहती थी। नई शिक्षा नीति देखकर यही लग रहा है कि सरकार ने राजनीतिक मध्यमार्ग अपनाया है। हर बच्चे को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है। नई शिक्षा नीति में स्पष्ट नहीं है कि सरकारी शिक्षा प्रणाली को कैसे बेहतर किया जाएगा। बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा दिया जाना सही विचार है, पर इसकी कीमत उन्हें अंग्रेजी के ज्ञान से वंचित रहकर चुकानी पड़ सकती है। क्या इससे निजी और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बीच खाई नहीं बढ़ेगी। क्या इसका असर भविष्य में बेहतर रोजगार पाने की संभावनाओं पर नहीं पड़ेगा। शिक्षा नीति में स्पष्ट नहीं हैं कि कोटा जैसे एजुकेशन हब बन गए शहरों का भविष्य क्या होगा।
दिल्ली के उपमुख्यमंत्री व शिक्षा मंत्री मनीष शिशोदिया ने कहा है कि अगले 20-25 साल बाद क्या होगा, पर मंथन से पहले सरकार को आज के हालात में बच्चों के लिए बेहतर क्या हो सकता है, इस पर विचार करना चाहिए। आज आलम यह है कि कोरोना महामारी के चलते आनलाइन शिक्षा और परीक्षा में हजारों छात्रों को पढ़ाई से वंचित होने का डर सता रहा है। यदि इन बच्चों का वर्तमान सुधर गया तो भविष्य सुधरने में देर नहीं लगेगी। नई शिक्षा नीति की खास बात यह है कि भाजपा ने अपने दृष्टिकोण को बदलते हुए विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश में दरवाजे खोल दिए हैं। दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अब देश में अपने कैंपस खोल सकेंगे।
यूपीए-2 सरकार में विदेशी शिक्षण संस्थानों पर रेगुलेशन आफ एंटी एंड आपरेशन बिल 2010 लाया गया था। उस समय भाजपा ने इसका विरोध किया था। लेकिन अब केंद्र की सरकार इसके लिए तैयार दिख रही है। इसके पीछे तर्क है कि हर साल सैकड़ों विद्यार्थी हजारों डालर खर्चे करके शिक्षा पाने को विदेश जाते हैं। अब विदेशी विश्वविद्यालयों के देश में आने से प्रतिभा पलायन तो रुकेगा ही और धन भी बाहर नहीं जाएगा।
सरकार को विस्तार से बताना चाहिए कि उच्च शिक्षा के लिए सिंगल रेगुलेटर उच्च शिक्षा आयोग गठित करके उसमें लॉ और मेडिकल को क्यों नहीं शामिल किया गया है। क्या कोचिंग सेंटर्स के जाल को काट पाने में सिंगल रेगुलेटर सक्षम होगा। नेशनल रिसर्च फाउंडेशन बनाने से क्या रिसर्च लायक माहौल भी बन पाएगा। बीते कई वर्षों में देश में वैज्ञानिक नजरिए का घोर अभाव देखा गया है, इसे कैसे सुधारा जाएगा। शिक्षा का नीजिकरण सरकार कैसे रोकेगी। सरकारी स्कूलों व निजी स्कूलों की खाई को कैसे पाटा जाएगा जैसे कई सवाल हैं जिन पर नई शिक्षा नीति मौन है।
