हावी धार्मिक कट्टरता

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Edited By Amrit Vichar
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पाकिस्तान के लाहौर में गुरुद्वारा शहीदी अस्थान को मस्जिद में बदलने की खबरों से विवाद खड़ा हो गया है। इसे सिख अल्पसंख्यकों के हितों पर कुठाराघात माना जा रहा है। भारत सरकार ने इसे लेकर अपनी चिंता पाकिस्तान के उच्च आयोग के समक्ष दर्ज कर दी है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि गुरुद्वारा शहीदी …

पाकिस्तान के लाहौर में गुरुद्वारा शहीदी अस्थान को मस्जिद में बदलने की खबरों से विवाद खड़ा हो गया है। इसे सिख अल्पसंख्यकों के हितों पर कुठाराघात माना जा रहा है। भारत सरकार ने इसे लेकर अपनी चिंता पाकिस्तान के उच्च आयोग के समक्ष दर्ज कर दी है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि गुरुद्वारा शहीदी अस्थान एक ‘ऐतिहासिक गुरुद्वारा’ है, सिखों के लिए ‘श्रद्धा का एक स्थल है’ और इसे मस्जिद घोषित किए जाने की मांग को लेकर भारत में गंभीर चिंता है। पाकिस्तान में ‘अल्पसंख्यक सिख समुदाय के लिए न्याय’ की मांग करते हुए, मंत्रालय ने भारत में पाकिस्तान के उच्च आयोग से मांग की है कि मामले की जांच की जाए और ‘उपचारात्मक कदम’ उठाए जाएं।

गौरतलब है कि लाहौर के नौलखा बाजार स्थित गुरुद्वारा शहीद अस्थान को सिख शहीद भाई तारु सिंह की शहादत का स्थान माना जाता है। माना जाता है कि तारु सिंह ने सिख मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी थी। जहां उनकी मृत्यु हुई थी, वहीं पर उनकी याद में एक गुरुद्वारा बनाया गया जिसे शहीदी अस्थान के नाम जाना जाता है। अब इस गुरुद्वारे को मस्जिद में तब्दील किए जाने की खबरों से लगता है कि देश और वक्त अलग है लेकिन धर्म के वर्चस्व का जुनून एक जैसा ही है। हाल ही में तुर्की मे ऐतिहासिक हागिया सोफिया को म्यूजियम से फिर मस्जिद बनाया गया और पिछले शुक्रवार को वहां नमाज पढ़कर कट्टरपंथ की दिशा में कदम आगे बढ़ा दिए गए।
आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के हालात एक जैसे ही थे लेकिन पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता राजनीति पर हावी रही।

पाकिस्तान बनने के कुछ समय बाद से ही वहां धार्मिक कट्टरता को खाद पानी मिलने लगा, जिससे वहां सैन्य तानाशाही हावी रही और कट्टरपंथियों ने इसका भरभूर लाभ उठाया। जबकि भारत ने अपनी धार्मिक व भाषायी विविधता को बरकरार रखा। उदार लोकतंत्र के कारण ही हम दुनिया में अलग पहचान बना पाए। धर्म को राजनीति का आधार बनाने का खामियाजा पाकिस्तान की पीढ़ियां भुगत रही हैं। लगता है वहां के राजनेता अब भी कोई सबक नहीं ले रहे हैँ। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के हितों के लिए भारत सरकार हमेशा से ही चिंता करती आई है। पर क्या आज भारत में भी भावी पीढ़ियों को देश की पहचान बहुलतावाद से वंचित रखने की कोशिश नहीं की जा रही है।