प्लास्टिक कचरे का खतरा
प्लास्टिक कचरे की समस्या भारत सहित पूरी दुनिया के लिए गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है। दुनिया में निर्मित होने वाले प्लास्टिक का करीब 80 फीसदी हिस्सा कचरे के रूप में धरती, पानी और वातावरण में शामिल हो जाता है। प्लास्टिक का कचरा इसलिए पर्यावरण के लिए एक बड़ा संकट बन गया है, क्योंकि उसका क्षरण सैकड़ों वर्षों में होता है। एक शोध के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों में वायु प्रदूषण को खतरनाक बनाने में प्लास्टिक का योगदान है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान के बावजूद प्लास्टिक से बनी वस्तुओं पर रोक नहीं लग पाई है। पूरी तरह पाबंदी की सीमा 2022 तक तय की गई थी, परंतु विभिन्न कारणों से इसे आगे बढ़ाना पड़ सकता है। गौरतलब है कि इस वर्ष 1 जुलाई को, देश में प्लास्टिक कचरे की समस्या को दूर करने के लिए चम्मच, स्ट्रॉ, प्लेट और पॉलिथीन बैग सहित 19 सिंगल-यूज़ प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाकर बड़ा कदम उठाया गया।
30 सितंबर 2021 से 75 माइक्रोन से कम मोटे बैग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। भारत के सिंगल-यूज़वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध को दुनिया भर में सराहा गया और प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए इसे एक विकासशील देश द्वारा बड़े कदम के रूप में देखा गया। प्रतिबंध के पांच महीने बाद साफ है कि धरातल पर इसको लागू करने के लिए अभी
लंबा रास्ता तय करना है।
भारत में हर साल लगभग साढ़े नौ मिलियन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत ने 2019 और 2020 में लगभग 34.7 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न किया। पिछले पांच सालों में, प्रति व्यक्ति प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पादन लगभग दोगुना हो गया है। द् एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में निर्मित लगभग 43 प्रतिशत प्लास्टिक का उपयोग पैकेजिंग के लिए किया जाता है, जिनमें से अधिकांश सिंगल-यूज़ हैं जिसका अर्थ है कि यह एक बार उपयोग के बाद अपशिष्ट प्रणाली में प्रवेश करता है।
देश में लगभग 60 प्रतिशत प्लास्टिक कचरे को रिसाइकिल किया जाता है, बाकी को जला दिया जाता है या लैंडफिल में दबा दिया जाता है। वैसे भी देश में कचरा प्रबंधन उद्योग की अनियमित प्रकृति के कारण हमारा देश दुनिया भर के कचरे का डंपिंग ग्राउंड बन गया है। यह बात हमारे पर्यावरण और जन स्वास्थ्य दोनों के लिए नुकसानदेह है। समझना मुश्किल है कि एकल इस्तेमाल वाले प्लास्टिक के खतरों को जानते-समझते हुए भी लोग इसके प्रयोग से बचने की कोशिश क्यों नहीं करते। इसके लिए उचित निगरानी के साथ-साथ जिम्मेदार उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा देना बहुत जरूरी है।
