समान शिक्षा की व्यवस्था !

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Edited By Amrit Vichar
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संसद में चर्चा के बिना ही शिक्षा नीति को लेकर इतने महत्वपूर्ण फैसले कैसे हो गए, इस पर अधिक सवाल नहीं उठ रहे हैं। मार्च से बंद शैक्षणिक संस्थान अगस्त में भी बंद ही हैं और आगे न जाने कब तक इनके बंद रहने की नौबत आए। क्योंकि कोरोना तो अब 50-55 हजार की रफ्तार …

संसद में चर्चा के बिना ही शिक्षा नीति को लेकर इतने महत्वपूर्ण फैसले कैसे हो गए, इस पर अधिक सवाल नहीं उठ रहे हैं। मार्च से बंद शैक्षणिक संस्थान अगस्त में भी बंद ही हैं और आगे न जाने कब तक इनके बंद रहने की नौबत आए। क्योंकि कोरोना तो अब 50-55 हजार की रफ्तार से बढ़ रहा है और मरीजों के आंकड़े अभी 18 लाख के पार हैं, आने वाले दिनों में यह गिनती कहां पहुंचेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। कोरोना की रोकथाम के जब तक पुख्ता इंतजाम नहीं हो जाते, तब तक स्कूल-कालेज नहीं खुलेंगे।

सरकार का पूरा जोर ऑनलाइन शिक्षण पर है, जिसमें अभी कक्षाएं भी हो रही हैं, बच्चों से प्रोजेक्ट बनवाने से लेकर निबंध लेखन और योग करवाने तक के काम करवाए जा रहे हैं और बीच-बीच में टेस्ट भी हो रहे हैं। साधन संपन्न परिवारों के लिए यह सब बहुत सुविधाजनक है। लेकिन क्या भारत केवल संपन्न तबके का देश है, क्या इस देश के गरीब बच्चों को कोरोना के बहाने पढ़ाई से भी वंचित कर दिया जाएगा। गरीब मां-बाप को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कितना बोझ उठाना पड़ेगा। पहले स्कूलों में ड्रापआउट की समस्या बढ़ी हुई थी और अब ऑनलाइन शिक्षा होने के कारण गरीब परिवारों के लाखों बच्चों की पढ़ाई छूट गई है।

भारत में करीब एक अरब आबादी के पास ऐसे फोन हैं, जो इंटरनेट की सुविधा से लैस हैं। स्कूल बंद होने के कारण इंटरनेट तक पहुंच बच्चों के लिए सबसे अहम चीज हो गई जिससे वे अपनी पढ़ाई से जुड़े रहें। इसी वजह से कई गरीब या कम आय वाले परिवार सस्ता या फिर सेकंड हैंड स्मार्टफोन खरीद रहे हैं। स्कूल जाने वाले 24 करोड़ बच्चों की वजह से कम कीमत वाले स्मार्ट फोन उद्योग के लिए नए ग्राहक वरदान साबित हो सकते हैं। उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में इस्तेमाल हो चुके हैंडसेट की बिक्री बढ़ी है। ऑनलाइन पढ़ाई के कारण कई बच्चे न केवल शिक्षा से वंचित हो रहे हैं, वहीं बहुत से बच्चों की सेहत पर अब इसका असर देखने मिल रहा है।

विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ऑनलाइन क्लासेज की वजह से बच्चों में अब साइड इफेक्ट्स सामने आ रहे हैं। हम यह देखकर खुश हैं कि स्ट्रीटलाइट के नीचे पढ़ने वाली बच्ची ने दसवीं कक्षा पास कर ली। पर यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर किसी को स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने या फ्लाइओवर के नीचे स्कूल खोलने की जरूरत ही क्यों पड़ती है। सरकार ने हर बच्चे के लिए एक समान शिक्षा की व्यवस्था क्यों नहीं की।