खतरे की घंटी
दुनिया में औद्योगिक क्रांति के बाद तेजी से बढ़ी ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन हुआ है। पारिस्थितिकी तंत्र में नित नए असंतुलन की वजह से पूरी दुनिया पर कई तरह के खतरे मंडरा रहे हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि औसत तापमान में लगभग एक डिग्री तक की वृद्धि से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ी है।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाले दशकों में चाहे दुनिया ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश लगा ले, लेकिन दुनिया के ग्लेशियरों का एक तिहाई से अधिक हिस्सा वर्ष 2100 से पहले पिघल जाएगा। यानि ग्लेशियर वैज्ञानिकों की कल्पना से कहीं ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं।
ग्लेशियरों के पिघलने से उन लोगों पर खासा असर पड़ेगा जिनके लिए ग्लेशियर ही पानी का प्रमुख स्रोत हैं। ग्लेशियर गर्मी में थोड़ा पिघलता है और सर्दियों में और बड़ा बन जाता है। इसका मतलब है कि लोगों को जब पानी की ज्यादा जरूरत होती है तो उन्हें ग्लेशियर से पानी मिलता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक दुनिया भविष्य के वैश्विक ताप को एक डिग्री के दसवें हिस्से से कुछ ज्यादा तक सीमित कर सकती है और अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल कर सकती है जो तकनीकी रूप से संभव है लेकिन इसके आसार कम दिख रहे हैं।
पत्रिका ‘साइंस’ में प्रकाशित अध्ययन में दुनिया के 2,15,000 जमीन आधारित ग्लेशियर का अध्ययन किया गया है। इनमें ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक में बर्फ की चादर पर बने ग्लेशियर शामिल नहीं हैं। इनमें से लगभग साढ़े 9 हज़ार केवल भारत में हैं। हालांकि ऐसी आशंका पहली बार नहीं जताई गई है। पर मुश्किल है कि बार-बार के अध्ययनों में पर्यावरण के सामने खड़ी होने वाली चुनौतियों के बारे में स्पष्ट संकेत मिलने के बावजूद दुनिया भर में इस मसले पर कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है।
अभी सारी बहस पृथ्वी के तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकने को लेकर है। ग्लेशियरों के आसपास के क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां सीमित करनी होंगी। इसका परिणाम इन ग्लेशियरों के पिघलने की गति में कमी के रूप में सामने आएगा। लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा तो तापमान में हो रही वृद्धि पर अंकुश लगाने का है, जिसके बिना सारे प्रयास बेमानी होंगे। वैज्ञानिकों के अनुसार तापमान को बढ़ने से रोकने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा।
अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्ताव तैयार किए जाते हैं, मगर उन पर गंभीरता से अमल नहीं हो पाता। अगर समय रहते अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठोस पहल नहीं की गई तो इसका खमियाजा पूरी दुनिया को उठाना पड़ सकता है।
