आंकड़ों में पारदर्शिता

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Edited By Amrit Vichar
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पहले से परेशानी झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कोरोना वायरस का हमला एक बड़ी मुसीबत लेकर आया। जब चीन और अमरीका जैसी मजबूत अर्थव्यवस्थाएं कोरोना के सामने लाचार हो गई हैं। इससे भारत में विदेशी निवेश के ज़रिए अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने की कोशिशों को भी धक्का पहुंचेगा। सरकार निवेश के ज़रिये नियमों में राहत …

पहले से परेशानी झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कोरोना वायरस का हमला एक बड़ी मुसीबत लेकर आया। जब चीन और अमरीका जैसी मजबूत अर्थव्यवस्थाएं कोरोना के सामने लाचार हो गई हैं। इससे भारत में विदेशी निवेश के ज़रिए अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने की कोशिशों को भी धक्का पहुंचेगा। सरकार निवेश के ज़रिये नियमों में राहत और आर्थिक मदद देकर अर्थव्यवस्था को रफ़्तार देने की कोशिश कर रही थी। लेकिन, इस बीच कोरोना वायरस के चलते पैदा हुए हालात ने जैसे अर्थव्यवस्था का पहिया जाम कर दिया है।

जानकारों की मानें तो लॉकडाउन और कोरोना वायरस के इस पूरे दौर में सबसे ज़्यादा असर एविएशन, पर्यटन, होटल सेक्टर पर पड़ने वाला है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन ने कहा था कि कोरोना वायरस सिर्फ़ एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट नहीं रहा, बल्कि ये एक बड़ा लेबर मार्केट और आर्थिक संकट भी बन गया है जो लोगों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा। आईएलओ के अनुसार कोरोना वायरस की वजह से दुनियाभर में ढाई करोड़ नौकरियां ख़तरे में हैं।

जानकार बताते हैं कि वर्तमान में सरकार के पास कोरोना महामारी से सिकुड़ी अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए कोई निश्चित नीति नहीं है। हालांकि इस बारे में सोचने के लिए यह उपयुक्त समय नहीं है। कोई सरकार तब तक विश्वसनीय आर्थिक नीति नहीं बना सकती जब तक कि उसके आंकड़े ठोस न हों। इसलिए जरूरी है कि सरकार तीन महीने के भीतर वृहद आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता बहाल करे।

आजादी के तुरंत बाद, सरकार ने भारतीय सांख्यिकीय संस्थान को डेटा संग्रह करने के लिए व इसे प्रबंधित करने के लिए भारतीय सांख्यिकीय सेवा बनाई। इसने बहुत कम सोचा था कि कौन सा डेटा उपयोगी होगा, और अक्सर इसे एकत्र किए गए डेटा को प्रकाशित करने में इतना समय लगता है कि वे बेकार हो जाते थे। लेकिन इसके आंकड़े विश्वसनीय थे। अब पहला आवश्यक कदम सांख्यिकीय सेवा की स्वतंत्रता को बहाल करना है। सरकार इसे अधिक उपयोगी आंकड़े एकत्र करने और इसे तेजी से प्रकाशित करने के लिए कह सकती है।

सांख्यिकीय सेवा का प्रबंधन पूरी तरह से पारदर्शी व राजनीति से मुक्त होना चाहिए। सीमित उपाय हमारी सरकार के संकट को हल नहीं कर सकते। आर्थिक नीति में एक दीर्घकालिक आयाम होना चाहिए। यह काम योजना आयोग को दिया गया था, जो सोवियत संघ से जवाहरलाल नेहरू द्वारा आयातित एक विचार था। लेकिन इसे वित्त मंत्रालय या वित्त आयोग को भी दिया जा सकता है। नीति निर्धारक के रूप में सरकार में अर्थशास्त्रियों का होना आवश्यक है। सरकार को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों को आमंत्रित करना चाहिए कि वे हमारी अर्थव्यवस्था का अध्ययन करें और सुझाव दें कि हमें क्या करना चाहिए।