बड़ा फैसला

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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कॉलेज पाठ्यक्रम व बाजार की मांग के बीच बढ़ती खाई को पाटने के लिए शिक्षा क्षेत्र को बढ़ावा देने की आवश्यकता लगातार महसूस की जाती रही है। भारत 2022 के वैश्विक प्रतिभा प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक में 133 देशों में 101 वें स्थान पर है। स्थिति बेहतर करने के लिए केंद्र सरकार भारतीय छात्रों को सस्ते दाम पर विदेशी योग्यता प्राप्त करने और भारत को एक आकर्षक वैश्विक अध्ययन केंद्र बनाने के लिए शिक्षा क्षेत्र में आमूल परिवर्तन पर जोर दे रही है। 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अब विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भारत में कैंपस स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। इसके लिए यूजीसी ने एक मसौदा तैयार किया है। जिसके तहत अब विदेशी विश्वविद्यालय भी भारत में अपने कैंपस खोल सकेंगे। यह कदम भारतीय छात्रों और उन संस्थानों दोनों के लिए फायदेमंद होगा जो भारत के तेजी से बढ़ते शिक्षा बाजार में निवेश करने में रुचि रखते हैं। साथ ही प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, व्यवसाय अध्ययन, कला और मानविकी जैसे विविध क्षेत्रों में विदेशी डिग्री हासिल करने की इच्छा रखने वाले भारतीय छात्रों को गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त होगी। इससे उच्च शिक्षा हेतु विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में कमी आएगी। 

यूनेस्को इंस्टीट्यूट फॉर स्टैटिस्टिक्स के अनुसार वर्ष 2022 में 4.5 लाख से अधिक भारतीय छात्र अध्ययन के लिए विदेश गए थे। देश में इससे पूर्व भी शिक्षा के वैश्वीकरण के कई प्रयास किए गए। 1995 में विदेशी विश्वविद्यालयों को आकर्षित करने के लिए पेश पहला विधेयक निरस्त कर दिया गया था। वर्ष 2005-2006 में इससे संबंधित एक और मसौदा कानून केवल कैबिनेट तक ही जा सका।  अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा के वैश्वीकरण के विचार को पुनः गति प्रदान की है। देश में आने वाले संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय परिसरों में शिक्षा की गुणवत्ता मूल परिसरों के समान हो। 

विश्वविद्यालय ऐसे किसी भी ‘ अध्ययन-कार्यक्रम’  की पेशकश नहीं करेंगे जो भारत के राष्ट्रीय हित या भारत में उच्च शिक्षा के मानकों को खतरे में डालता हो। शुरुआत में विश्वविद्यालयों को केवल 10 साल तक काम करने की मंजूरी दी जाएगी, जिसे बाद में प्रदर्शन के आधार पर बढ़ाया जा सकता है। मसौदा नियमों की घोषणा के साथ ही इनका विरोध भी शुरू हो गया है। विरोधियों का कहना है कि सामाजिक न्याय की चिंताओं को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। उधर यूरोप के कुछ देशों के विश्वविद्यालयों ने भारत में परिसर स्थापित करने में रूचि दिखाई है। अंत में यह योजना कितनी सफल होगी यह तो समय ही बताएगा।