जीवन प्रत्याशा में वृद्धि
आधुनिकता के कई वरदानों में से एक है जीवन प्रत्याशा में वृद्धि। दुनिया भर में लोग पहले की तुलना में कहीं अधिक लंबा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जीवन प्रत्याशा 1950 और 2010 के बीच 46 से 68 साल तक बढ़ती रही है। 2021 में जन्म लेने वाले बच्चे की जीवन प्रत्याशा, औसतन, 1950 में पैदा होने वाले बच्चे की तुलना में, लगभग 25 वर्ष अधिक है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक विश्व भर में 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या वर्ष 2050 तक मौजूदा 76 करोड़ 10 लाख से बढ़कर एक अरब 60 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है।
इसके मद्देनज़र यूएन विशेषज्ञों ने एक टिकाऊ भविष्य के लिए सामूहिक प्रयासों के केन्द्र में वृद्धजन कल्याण और उनके अधिकारों को प्राथमिकता दिए जाने का आग्रह किया है। आर्थिक और सामाजिक मामलों में संयुक्त राष्ट्र विभाग की रिपोर्ट विश्व जनसंख्या संभावना 2022 ने अनुमान लगाया है कि भारत 2050 तक दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश होगा। गौरतलब है कि सदी के मध्य तक देश की बुजुर्ग आबादी दोगुनी हो जाएगी। यानी भारत की आबादी में वृद्धों की आबादी तेजी से बढ़ रही है।
आबादी की आयु बढ़ रही है, मगर इनमें बेहतरी का लाभ हर किसी तक समान रूप से नहीं पहुंचा है। देश में कई कानूनी प्रावधान भी किए गए हैं लेकिन समाज में बुजुर्गों के बीच जागरूकता की कमी की वजह से इसके असर का दायरा सीमित रहा। सवाल है कि निकट भविष्य में वृद्ध जनों को जीवन की अच्छी गुणवत्ता प्रदान करने के लिए क्या किया जा सकता है? बुजुर्गों की परेशानियों को कम करने के लिए राजनीतिक क्षेत्र में भी समय-समय पर मांग उठती रही है।
एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण से उजागर हुआ कि कम से कम 47 प्रतिशत वृद्ध जन आय के लिए अपने परिवारों पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं और 34 प्रतिशत पेंशन एवं सरकारी नकद हस्तांतरण पर निर्भर हैं जबकि सर्वेक्षण में शामिल 40 प्रतिशत लोगों ने ‘जब तक संभव हो’ तब तक कार्य करते रहने की इच्छा प्रकट की। वृद्ध व्यक्तियों के लिए एक सम्मानजनक जीवन की दिशा में पहला कदम यह होगा कि उन्हें निराश्रिता और इससे संबंधित अभावों से बचाया जाए। भारत निकट भविष्य में वृद्ध जनों के लिए जीवन की अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित करना चाहता है तो इसके लिए योजना निर्माण और उसका क्रियान्वन शीघ्र ही शुरू कर देना चाहिए।
