नियुक्तियों पर बड़ा फैसला
मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता लाने की मांग पर उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को अहम फैसला दिया। पीठ ने इन नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली की मांग करने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया। सर्वोच्च अदालत ने आदेश दिया कि अब से चुनाव आयोग के सदस्यों का चयन एक समिति करेगी जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश होंगे।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर विपक्ष का कोई नेता नहीं होगा तो लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता इस समिति का सदस्य होगा। अभी तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी। नियुक्ति अभी भी राष्ट्रपति ही करेंगे लेकिन समिति की सलाह पर। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार नियुक्ति प्रक्रिया पर एक नया कानून ला सकती है लेकिन जब तक ऐसा कानून नहीं आता तब तक यह प्रक्रिया लागू रहेगी।
याचिका में मांग की गई थी कि इस बड़े संवैधानिक पद पर सीधे सरकार की तरफ से नियुक्ति सही नहीं है। विपक्षी पार्टियों ने कई बार चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं और सरकार द्वारा की जाने वाली आयुक्तों की नियुक्ति, विपक्ष के आरोपों का एक प्रमुख आधार रहा है। गौरतलब है कि जस्टिस के एम जोसफ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई गत 24 नवंबर को पूरी की थी। संविधान पीठ ने चुनाव प्रक्रिया में शुद्धता पर जोर दिया और कहा कि लोकतंत्र आंतरिक रूप से लोगों की इच्छा से जुड़ा हुआ है।
अदालत ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर बैठा व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो किसी से भी प्रभावित हुए बिना अपना काम कर सके। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने एक ट्वीट में कहा कि यह मांग दो दशकों से लंबित थी। सवाल है कि आखिर ये फैसला इतना महत्वपूर्ण क्यों है? सरकार की सलाह पर नियुक्ति होने की वजह से अक्सर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। समिति की ओर से नियुक्ति होने पर चुनाव आयोग स्वतंत्र होकर काम कर पाएगा और उस पर विश्वास भी बढ़ेगा।
महत्वपूर्ण है कि सर्वोच्च अदालत ने ये फैसला सर्वसम्मति से सुनाया है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को सरकार के नियंत्रण से बाहर करना चुनाव सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम कहा जा रहा है। खास बात है कि अदालत ने नियुक्ति के साथ-साथ चुनाव आयोग की वित्तीय स्वतंत्रता में भी सुधार लाने के आदेश दिए। तटस्थता व निष्पक्षता को लेकर उठने वाले सवाल निर्वाचन आयोग के लिए भी एक चुनौती रहे हैं। इस फैसले के बाद कहा जा सकता है कि प्रत्येक चुनौती के साथ सुधार की संभावनाएं भी जुड़ी होती हैं।
