लोकतंत्र: अधिकार और कर्तव्य
लोकतंत्र एक बहुआयामी शब्द है। इसके तहत अगर बहुत प्रकार की स्वतंत्रता हमें प्राप्त होती है तो कर्तव्यों का भाव भी होना चाहिए। लोकतंत्र के नाम पर सिर्फ अधिकारों की बात करना कतई तर्क संगत नहीं। हमें राष्ट्र, समाज व संस्कृति के प्रति कर्तर्व्यों का भी निर्वहन करना चाहिए तभी एक सुंदर राष्ट्र बन सकेगा। …
लोकतंत्र एक बहुआयामी शब्द है। इसके तहत अगर बहुत प्रकार की स्वतंत्रता हमें प्राप्त होती है तो कर्तव्यों का भाव भी होना चाहिए। लोकतंत्र के नाम पर सिर्फ अधिकारों की बात करना कतई तर्क संगत नहीं। हमें राष्ट्र, समाज व संस्कृति के प्रति कर्तर्व्यों का भी निर्वहन करना चाहिए तभी एक सुंदर राष्ट्र बन सकेगा। लोकतंत्र बहुमूल्य होता है। इसी के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपने-अपने धर्म को मानने की आजादी मिलती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश इसीलिए कहा जाता है कि यहां वैयक्तिक आजादी प्रमुख है। चीन और उत्तर कोरिया जैसे देशों में इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का लोप है। उन देशों में जाने के बाद स्वतंत्रता का महत्व समझ में आता है।
बहरहाल भारत में इसी स्वतंत्रता का दुरुपयोग हो रहा है वह चिंता का विषय है। बुधवार को फेसबुक पर एक पोस्ट के चलते बेंगलुरू में दंगे भड़क गए। कई लोगाें की जान गई, सैकड़ों वाहन फूंक दिए गए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग ने एक हंसते-खेलते शहर को झुलसा दिया। अभिव्यक्ति की आजादी जरूरी है लेकिन झूठे, कुतर्की और चालाक लोग इसी आजादी का जब दुरुपयोग करते हैं तो बेहद घातक हालात पैदा हो जाते हैं। समाज में असंतोष, तनाव और हिंसा का माहौल बन जाता है। इन्हीं वजहों से कई बार सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर प्रतिबंध की मांग होने लगती हैं।
बौद्धिक जगत को डर है कि नासमझ लोगों की हरकतों के चलते कहीं आजादी को सीमित न कर दिया जाए। स्वतंत्रता निश्चित रूप से वैयक्तिक होती है। प्रति व्यक्ति की स्वतंत्रता को मिलाकर सामूहिक हो जाती है। यह तब तक अपूर्ण है जब तक इसे कर्तव्यों की गांठ से न बांधा जाए। आप अपने व्यक्तिगत जीवन में कुछ भी करें परंतु यदि आपकी हरकतों के कारण दूसरे की स्वतंत्रता में दखल होता है तो आपकी स्वतंत्रता बेमानी है।
आजादी के 73 वर्ष बाद समीक्षा करें तो पायेंगे कि इस स्वतंत्रता का हमने कितना दुरुपयोग किया है। हमने सिर्फ अधिकारों के लिए आंदोलनों को अपनी स्वतंत्रता व अधिकार समझा है। कर्तव्यों की बात आते ही हम पीछे हट जाते हैं। चक्काजाम, बाजार बंद, रेल , ट्रेनें बंद, भारत बंद। डॉक्टरों की हड़ताल। बैंककर्मी अपनी मांगों को लेकर सड़क पर, अध्यापकों की हड़ताल। सिर्फ अधिकारों के लिए हड़ताल के स्थान पर कभी कर्तव्यों के लिए हड़ताल क्यों नहीं। किसी लेखक ने कहा है कि आपकी छड़ी की स्वतंत्रता वहां खत्म हो जाती है जहां से सामने वाले की नाक शुरू होती है।
