Mahoba: अब धीमी पड़ती जा रहीं ईसुरी की फागों की तान, ग्रामीण अंचलों में भी होली पर्व के मौके पर नहीं सुनाई देती

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Edited By Amrit Vichar
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महोबा में ग्रामीण अंचलों में भी होली पर्व के मौके पर फाग सुनाई नहीं देती।

महोबा में ग्रामीण अंचलों में भी होली पर्व के मौके पर फाग सुनाई नहीं देती। अब ईसुरी की फागों की तान धीमी पड़ती जा रहीं। वहीं, युवा पीढ़ी गांव में होने वाली फागों के प्रति पूरी तरह से अंजान है।

महोबा, [नईमुर्रहमान]। बदलते जमाने के साथ होली पर्व पर गाई जाने वाली फाग अब नहीं सुनाई देती। बुंदेलखंड के जनप्रिय लोक कवि ईसुरी की फागों की तान भी अब धीमी पड़ती जा रही है, वहीं जगह जगह अब फाग की जगह फिल्मी गीतों ने ले ली है। होली पर्व पर भी फागों की गूंज की बजाय लाउडर्स स्पीकरों में फिल्मी गीतों की आवाज सुनाई पड़ती हैै। अब इक्का दुक्का गांव में फाग होती भी है तो ताजा तरीन फिल्मी गानों की तर्ज पर होती है। नतीजतन ईसुरी की फाग की ताने अब गांव में नहीं सुनाई पड़ रहीं हैं। युवा पीढ़ी फागों के प्रति पूरी तरह से अंजान है, जिससे भविष्य में लोग कवि ईसुरी को ही भूल जाएंगे। 

गौरतलब है कि एक जमाना था, जब बुंदेलखंड के हर जिले में ईसुरी रचित फागों को गाए बिना होली नहीं होती थी। होली पर्व के पहले ही ग्रामीण अंचलों में फागों की ताने सुनाई पड़ने लगती थी। गांवों के अलावा शहर और कस्बों के कुछ इलाकों में भी खूब फागें गाई जाती थी। फगुवारों के दल अब बहुत कम निकलते हैं, लेकिन साउड सिस्टमों में जगह जगह गूंजते फिल्मी होली के गानों की ऊंची आवाजों के बीच उनकी ढोलक की थाप थम सी गई। लोग कवि ईसुरी में अपनी जिन भागों की रचना की थी उनमें श्रृंगार वियोग के पक्षों को सीधे साधे ग्रामीण शब्दों में पिरोया गया था, जिससे वह लोगों की जबान पर चढ़ गए थे। आध्यात्मिक लिहाज से उनके अर्थ जीवन मूल्यों के सशक्त पक्षधर थे, जो आम आदमी से जुडे़ हुए महसूस होते थे।  

इक्का दुक्का ग्रामीण अंचलों में फागों की महफिल सजी, जहां पर लोग ढोल मंजीरा, झांझर लेकर पहुंचे, लेकिन फाग की महफिल में सिर्फ बुर्जुग लोग ही नजर आए। फाग गाने वालों से लेकर सुनने वाले भी बुर्जुग ही थे। युवा पीढ़ी ने फाग सीखने का प्रयास करना तो दूर गांव में हो रही फाग को सुनने तक की जहमत तक नहीं उठाई, जबकि बुर्जुगों में फाग तानने की पहले जैसी ताकत नहीं रही, लेकिन उनमें फाग गाने का जोश और जज्बा कम नही हुआ, यही वजह है कि फाग तानने के दौरान उन्होंने किसी भी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ी।

एक के बाद एक बुर्जुग सुंदर फाग की तान खींचने में कोई कसर नहीं छोड़ता दिखाई दिया। फागें अपनी मिट्टी से जुड़ी होती थी, लेकिन आज फिल्मी गीतों और पाश्चात्य सभ्यता से युवा जुड़ कर मोबाइल में फिल्मी गीत और पाश्चात्य सभ्यता को पसंद कर रहा है। 

चरवाहे तक खेत खलिहानों में खाते थे ईसुरी की फागे 

समूचे बुंदेलखंड में ईसुरी की फागों को बेहद पसंद किया जाता था। बुंदेली भाषा में फाग रचने वाले लोक कवि ईसुरी की फागें इतनी सादा होती थी कि खेत खलिहानों और जंगलों में पशु चराने वाले चरवाहे तक उनकी फागे गा लेते थे। जबकि इन्हें गाने में अच्छे गायक भी लड़खड़ा जाते थे। इसके अलावा परम्परागत फागों के गायक भी इस त्योहार पर पुरानी फागों को गाते थे, जिसमें किसानों, मजदूरों के जीवन का चीतर्ण होता था, खेती किसानी की बाते होती थी और प्रेम रस के शब्दों में द्विअर्थी मजाक छिपे होते थे।

बुंदेलखंड की परम्परों के अनुरूप इनमें आल्हा ऊदल व अन्य वीरों की गाथाएं होती थी, धीरे धीरे यह गायन परम्परा कमजोर होती गई, अब होली में कस्बों व शहरों से फागे गायब सी हो गई हैं। दस दफा फाग के साउंड सिस्टम भी नहीं बजते सुनाई दे रहे है। अभी इक्का दुक्का देहाती क्षेत्रों में जरूर फागों का गायन करके ईसुरी की यादें ताजा कर दी गई। पहले होली पर्व से पूर्व गांवों में फागों के गायन की प्रतियोगिताएं होती थी, एक से एक सुंदर फार लोग गाते थे, लेकिन अब फागे नहीं सुनाई पड़ती हैं।

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