उत्सवों का योगदान
संस्कृति को बचाए रखने में उत्सवों का बड़ा योगदान रहा है और आज भी है। हमारे त्योहार देश-प्रदेश की विविधता को दर्शाते हैं। त्योहार समाज को घुलने-मिलने का अवसर देते हैं। होली केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि राग-रंग का लोकप्रिय पर्व है, जो समरसता का संदेश देता है। बंधुत्व, एकता, समरसता, सौहार्द्र को बढ़ाता है। सभी को बंधुत्व का संदेश देता है।
होली का संदेश है कि बुराई भले कितनी ही बड़ी क्यों न हो, पर अच्छाई के आगे उसका मिटना तय है। यह परिवर्तन प्रकृति का नियम है इसे स्वीकार करना चाहिए। होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएं भी अत्यंत प्राचीन हैं और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। ग्लोबल होती दुनिया में समय के साथ सारे संदर्भ बदल रहे हैं, तो होली जैसे उत्सव के भी संदर्भ बदल रहे हैं।
होली के हुड़दंग को होली की बुराइयां बदरंग कर देती हैं। शराब, भांग या दूसरे किस्म का नशा करके होली खेलना पर्व के महत्व को फीका कर देता है। इसलिए होली शालीन तरीके से मनाई जानी चाहिए। कोशिश यह की जाए कि इस त्योहार के बहाने पर्यावरण का संरक्षण भी हो। उत्सव को बदरंग बनने से रोकना होगा। इंटरनेट के बाद संवाद भी बढ़ा है।
आधुनिकता और संचार क्रांति के युग में उपकरणों के बढ़ते उपयोग ने होली को खुले मैदान, गली-मोहल्लों से मोबाइल के स्क्रीन पर लाकर रख दिया है। अब लोग होली वाले दिन भी घर में दुबके बैठे रहते हैं। आधुनिक होली व्हॉट्सएप और फेसबुक के संदेशों तक सिमटकर रह गई है। संचार की सुलभता से कुछ विकृतियां भी पनपी हैं।
सोशल मीडिया ने लोगों को जितना करीब किया है, कटुता बोकर उतना ही दूर भी किया है। यह त्योहार इस विकृति से मुक्ति पाने का समय भी है। ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ होली की मूल भावना है इसे हमें बचाना है, इसे जन-जन तक, मन-मन तक पहुंचाना है। समाज में नए प्रतिमानों को स्थापित करने की जरूरत है। हैरान कर देनी वाली बात है कि मार्च में ही तापमान 35 डिग्री पार कर रहा है।
मार्च की शुरुआत में इतना गर्म मौसम कभी नहीं हुआ। कहीं न कहीं यह बदली जीवन शैली और प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा है। अच्छी बात है कि लोग रासायनिक रंगों से दूर हो रहे हैं। प्राकृतिक रंगों का प्रयोग बढ़ा है। ध्यान रहे त्योहार मनाते समय हमारे व्यवहार में कसैलापन दूर-दूर तक न दिखे। आसपास मुस्कुराहट फैली रहे। उम्मीद है होली को प्रेममय तरीके से मनाएंगे।
