देश हमें देता है सब कुछ
देश सिर्फ सीमाओं से बंधा हुआ भूमि का कोई टुकड़ा नहीं होता। देश एक अवधारणा है जो पूरी होती है वहां के नागरिकों, संस्कृति व समाज से। जिस देश के नागरिक जितने जागरूक व जिम्मेदार होते हैं वह देश उतना ही जागा रहता है, हलचल में रहता है, दौड़ता है। तरक्की के रास्ते पर चल …
देश सिर्फ सीमाओं से बंधा हुआ भूमि का कोई टुकड़ा नहीं होता। देश एक अवधारणा है जो पूरी होती है वहां के नागरिकों, संस्कृति व समाज से। जिस देश के नागरिक जितने जागरूक व जिम्मेदार होते हैं वह देश उतना ही जागा रहता है, हलचल में रहता है, दौड़ता है। तरक्की के रास्ते पर चल निकलता है। कई देश इसका उदाहरण हैं।
राष्ट्र के प्रति समर्पित होना हमारा कर्तव्य है। हमेशा राष्ट्र के प्रति सकारात्मक सोच होनी चाहिए जिससे हर क्षेत्र में हम विकास कर पाएंगे। हर व्यक्ति सामाजिक, पारिवारिक होता है लेकिन इससे पहले वो एक नागरिक होता है और उसका पहला कर्तव्य राष्ट्र के प्रति ही है। अधिकार चाहिए तो अपने कर्त्तव्यों को करना चाहिए। हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। अधिकार जताने में आगे लेकिन जिम्मेदारी में पीछे रहना ठीक नहीं।
जिम्मेदारी के सवाल पर अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि देश ने हमें क्या दिया? वे कभी जवाब नहीं देते कि उन्होंने देश को क्या दिया। हमेशा मांगने का अधिकार पहले क्यों, देने का भाव क्यों नहीं? इसी देने के भाव में राष्ट्र के निर्माण की भावना निहित है। देश हमें वह सब कुछ देता है जिसके हम पात्र होते हैं। राष्ट्र हमें पहचान देता है। तो हमें भी राष्ट्र की पहचान बनना चाहिए।
आज 15 अगस्त है। यह दिन हमारे पूर्वजों ने अपना सर्वस्व स्वाहा कर हमें सौंपा है। ऐसे में बतौर नागरिक हमारी बड़ी जिम्मेदारी है। जातिवादी और साम्प्रदायिक सोच, अलगाववाद की भावना को देश-समाज से दूर करें। विश्वास के आपसी रिश्तों और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत रखें।
हम अपने हित के लिए प्राकृ़तिक संपदा नष्ट करने में जुटे हैं। हमने ही पशु-पक्षियों की अनेक प्रजातियां लुप्त कर दी हैं। घर के कोनों में चहचहाने वाली गौरैया खतरे में हैं। विकास के नाम पर पहाड़ों को भी मैदान बना दिया। जंगलों को बगीचा बनाने में जुटे हैं। खुद को बदलने की जरूरत है। देश के सभी लोग स्वतंत्रता का सही-सही आशय समझें। अपनी सीमाएं खुद तय करें। देश को देने के लिए तत्पर होंगे तो खुद व खुद बहुत कुछ अच्छा मिलने लगेगा।
‘देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।
पथिकों को तपती दुपहर में, पेड़ सदा देते हैं छाया,
सुमन सुगंध सदा देते हैं, हम सबको फूलों की माला,
औरों का भी हित हो जिसमें, हम ऐसा कुछ करना सीखें।’
