बदलाव पर बहस
नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) द्वारा बारहवीं कक्षा के इतिहास, नागरिक शास्त्र तथा हिंदी के पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर राजनीतिक घमासान मचा है। कहा जा रहा है कि इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है लेकिन इसे मिटाया नहीं जा सकता।
दुनिया में हमेशा सत्ताधीश अपने हिसाब से इतिहास की व्याख्या करने का प्रयास करते हैं। एनसीईआरटी के इस निर्णय को इसी नजरिये से देखा जा रहा है। जबकि भाजपा का कहना है कि कुछ बदला नहीं जा रहा है बल्कि इतिहास की जो बातें छिपाई गई थीं वह बताई जा रही हैं।
एनसीईआरटी ने इतिहास की पुस्तकों से राजाओं संबंधित अध्यायों व विषयों को हटा दिया है। शैक्षिक सत्र 2023-24 से इंटरमीडिएट में ‘आरोह भाग दो’ में कई परिवर्तन किए हैं। इसमें विद्यार्थी फिराक गोरखपुरी और ‘अंतरा भाग दो’ से सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचना नहीं पढ़ सकेंगे। इसके अलावा विश्व राजनीति में अमेरिकी आधिपत्य और द कोल्ड वॉर एरा जैसे अध्यायों को भी 12वीं की नागरिक शास्त्र की पाठ्यपुस्तक से हटा दिया गया है।
हालांकि एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने कहा कि इस वर्ष पाठ्यक्रम में कोई काटछांट नहीं की गई है। पाठ्यक्रम को पिछले वर्ष जून में युक्तिसंगत बनाया गया था और यह 2023-24 में भी जारी रहेगा। छात्रों का बोझ कम करने का प्रयास किया है तो कहीं कुछ पाठों में दोहराव को हटाया गया है।
मुगलों के बारे में अध्याय नहीं हटाए गए हैं। शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत नए पाठ्यक्रम ढांचे पर अभी भी काम चल रहा है और नई पाठ्यचर्या अकादमिक सत्र 2024 से पेश की जाएगी। अब मुद्दे पर देशव्यापी बहस शुरू हो गई है। राजनीतिक दलों कांग्रेस, सीपीएम, शिवसेना (उद्धव गुट) ने एनसीईआरटी के इस कदम पर विरोध जताया है।
साथ ही शिक्षाविदों, इतिहासकारों तथा बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया भी सामने आ रही हैं। कहा जा रहा है कि बेशक मुगलकाल हिंसा, दमन व लूट का दौर रहा हो, लेकिन उस कालखंड की विसंगतियों से सबक जरूर लेना चाहिए।
विद्यार्थियों को कौन बताएगा कि दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल किसने बनाया? निस्संदेह, दार्शनिक, वैज्ञानिक आदि अन्य दृष्टिकोणों की तरह ऐतिहासिक दृष्टिकोण की अपनी निजी विशेषता होती है। इसलिए इतिहास में भारतीयता की दृष्टि होनी अनिवार्य है। संप्रदाय विशेष की दृष्टि से इतिहास को नहीं देखा जाना चाहिए।
