धार्मिक आजादी का मुद्दा

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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अमेरिका के संघीय आयोग यूएससीआईआरएफ ने भारत में सरकारी एजेंसियों और अधिकारियों को धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का जिम्मेदार ठहराया है और बाइडन प्रशासन से सिफारिश की है कि उनकी संपत्तियों से जुड़े लेनदेन पर रोक लगाई जाए और उन्हें अमेरिका में प्रतिबंधित किया जाए। यह रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन की इसी वर्ष भारत यात्रा प्रस्तावित है।

उम्मीद की जा रही है कि अमेरिका और भारत के संबंधों के लिए यह यात्रा काफी अहम साबित होगी। साथ ही भारत का जी-20 में नेतृत्व दुनिया में अच्छाई के लिए एक ताकत के रूप में खड़े होने की क्षमता को व्यापक बनाता है। सोमवार को जारी रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि 2022 में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति लगातार खराब होती गई। पूरे वर्ष भारत सरकार ने राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर धार्मिक तौर पर भेदभाव की नीतियों को बढ़ावा दिया।

हालांकि, भारत ने आयोग की आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों की दशा पर उसकी टिप्पणियां पूर्वाग्रह से ग्रसित और पक्षपातपूर्ण हैं। विदेश विभाग के उप प्रवक्ता वेदांत पटेल ने कहा है कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता का परिचायक है तथा मौलिक अधिकारों के माध्यम से धार्मिक स्वतंत्रता को संरक्षण प्रदान करता है। साथ ही लोकतांत्रिक शासन और विधि के शासन को बढ़ावा भी देता है। 

संविधान किसी धर्म विशेष को मान्यता नहीं देता है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से भिन्न है क्योंकि पश्चिम की पूर्णतया अलगाववादी नकारात्मक अवधारणा के बजाय भारत में समग्र रूप से सभी धर्मों का सम्मान करने की संवैधानिक मान्यता प्रचलित है।

रिपोर्ट में कहा कि आयोग ने ईरान और पाकिस्तान सहित 12 देशों को ‘विशेष चिंता वाले देश’ के रूप में फिर से नामित करने की सिफारिश की है। गौरतलब है कि यूएससीआईआरएफ 2020 से भारत को इस सूची में शामिल करने के लिए सिफारिश कर रहा है। इसके अलावा, अमेरिका ने 2022 से अफगानिस्तान पर इसी तरह की सलाह देने से इनकार कर दिया है, जबकि यह देश अब तालिबान सरकार द्वारा चलाया जा रहा है।

अमेरिका के गैर-लाभकारी संगठन, फाउंडेशन ऑफ इंडियन एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज ने भी इस रिपोर्ट को पक्षपात पूर्ण बताते हुए इसकी आलोचना की है। वैसे भी इसको जारी करने के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता को बेहद व्यक्तिगत प्राथमिकता के रूप में संदर्भित किया गया। यूएससीआईआरएफ या किसी भी देश को भारत के जीवंत लोकतंत्र और विधि के शासन के बारे में आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है।