समय की जरूरत
वायुसेना का एक और मिग-21 विमान राजस्थान के सूरतगढ़ में सोमवार की सुबह हादसे का शिकार हो गया। विमान का पायलट सुरक्षित है,लेकिन हादसे की वजह से गांव की तीन महिलाओं की जान चली गई। मिग-21 जिस प्रकार हादसों का पर्याय बना हुआ है, वह चिंताजनक है। पिछले एक साल में वायुसेना के मिग-21 विमान गिरने की यह सातवीं घटना है।
अक्टूबर 2022 में पिछला हादसा हुआ था, उसमें वायुसेना के दो पायलटों की मौत हो गई थी। मिग-21 भारतीय वायुसेना द्वारा उड़ाए जाने वाले छह लड़ाकू विमानों में से एक हैं। 1962 में भारत-चीन युद्ध ने भारतीय वायुसेना में अधिक लड़ाकू विमानों की आवश्यकता को बढ़ा दिया था। उस समय मिग-21 भारत को एक अच्छा विकल्प लगा और सोवियत संघ (रूस) भारत में इसके उत्पादन के लिए तैयार था।
अंतत: सिंगल-इंजन, सिंगल-सीटर मल्टी-रोल फाइटर/ग्राउंड अटैक प्लेन को पहली बार 1963 में इंटरसेप्टर एयरक्राफ्ट के रूप में शामिल किया गया था। 1971 के भारत-पाक युद्ध और कारगिल युद्ध में मिग विमान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। परंतु पिछले तीन दशक से जिस तरह इसके हादसे बढ़े हैं, तब से इसकी लाभकारिता पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। इसे न युद्ध के लिए उपयोगी माना जा रहा है और न नियमित प्रशिक्षण उड़ान के काबिल।
रूस ने 1985 में ही इन विमानों को सेना से हटा दिया था। अफगानिस्तान और बांग्लादेश भी इसे हटा चुके हैं। भारत में लगभग 20 साल पहले मिग-21 को हटाने का प्रस्ताव दे दिया गया था, लेकिन इसकी जगह लेने वाले विमानों के अभाव के कारण ऐसा नहीं हो सका है। हालांकि भारतीय वायुसेना ने 2025 तक मिग-21 के सभी शेष स्क्वाड्रनों को धीरे-धीरे हटाने की योजना बनाई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह पुरानी तकनीक पर आधारित हैं और लैंडिंग के समय इनकी स्पीड ज्यादा होती है। पुराने और एडवांस वर्जन में काफी अधिक सुधार नहीं हुआ है। विमान का सुरक्षा रिकॉर्ड बहुत खराब है। भारत में पिछले पांच दशकों में 400 क्रैश में 200 पायलटों की जान गई है। रूसी विमान को लेकर कई बार सवाल खड़े किए गए हैं।
मिग-21 के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद वायुसेना के बेड़े में शामिल मिग विमानों को लेकर फिर से सवाल खड़े होना स्वाभाविक हैं। निरंतर होते ऐसे हादसों का सीधा असर वायुसेना की युद्धक क्षमता और उसके मनोबल पर पड़ता है। इस पुराने विमान को अतीत की चीज बनाने का समय आ गया है।
