कूटनीतिक प्राथमिकता
विस्तारवादी नीति के तहत चीन प्रशांत द्वीपीय देशों (पीआईसी) में अपनी दखल लगातार बढ़ा रहा है। आर्थिक उदारता का झांसा देकर वह 14 प्रशांत द्वीपीय देशों में से 10 से राजनयिक मान्यता प्राप्त करने में सफल रहा है। केवल चार वर्तमान में ताइवान को मान्यता देते हैं।
14 राज्यों का यह समूह एशिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच प्रशांत महासागर के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र से संबंधित है। पीआईसी को प्रभावित करने की मजबूरी ऐसे समय में चीन के लिए और भी अधिक दबाव का विषय बन गई है जब चीन के विरोध स्वरुप हिंद-प्रशांत में चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता (क्वाड) एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरी है।
प्रशांत द्वीपों के प्रति चीन की कूटनीति की तीव्रता ने क्षेत्र की शक्तियों को एकजुटता प्रदान की है। कूटनीतिक प्राथमिकता के तहत भारत हिंद प्रशांत देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है। इस नजरिए से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पापुआ न्यू गिनी की यात्रा को सफल माना जा रहा है।
पोर्ट मोरेस्बी में परोक्ष रुप से चीन का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रशांत द्वीपीय देशों के नेताओं से कहा कि सच्चा मित्र वही होता है, जो कठिन घड़ी में काम आए। जबकि जिन्हें विश्वासपात्र समझा जाता था वे जरूरत के समय साथ खड़े नहीं रहे। तीसरे प्रशांत द्वीप समूह सहयोग शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत चुनौतीपूर्ण समय में प्रशांत द्वीपीय देशों के साथ खड़ा रहा।
भारत का 14 प्रशांत द्वीप देशों (पीआईसी) के साथ जुड़ाव उसकी ‘एक्ट ईस्ट नीति का हिस्सा है। वास्तव में वह केवल द्वीप राष्ट्र ही नहीं है बल्कि महासागरीय देश हैं। गौरतलब है कि साझा आर्थिक और सुरक्षा चिंताओं द्वारा संबंधित 14 प्रशांत द्विपीय देश संयुक्त राष्ट्र में मतदान के लिये ज़िम्मेदार हैं और अंतर्राष्ट्रीय राय जुटाने के लिए प्रमुख शक्तियों के संभावित वोट बैंक के रूप में कार्य करते हैं। इसलिए पीएम मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी मजबूती से सुनी जानी चाहिए।
उन्होंने सभी द्वीपीय देशों से संयुक्त राष्ट्र में ग्लोबल साउथ की आवाज उठाने और 2028-29 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में भारत की सदस्यता के लिए समर्थन भी मांगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीआईसी के लिए 12 सूत्री एक्शन प्लान तैयार किया है। उम्मीद की जा सकती है कि प्रधानमंत्री मोदी के आश्वासन के बाद प्रशांत द्वीपीय देश भारत को अपने विकास के एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में देखेंगे। इससे हिंद प्रशांत महासागर क्षेत्र स्थिर, मुक्त और समृद्ध बनेगा।
