भारत रत्न प्रणब दा

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पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी का सोमवार 31अगस्त को निधन हो गया इसके साथ ही भारतीय राजनीति में एक युग का भी अंत हो गया। 1969 में राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना संसदीय करियर शुरू करने वाले प्रणब दा अध्यापन और पत्रकारिता के बाद राजनीति के क्षेत्र आए और अंत में देश के …

पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी का सोमवार 31अगस्त को निधन हो गया इसके साथ ही भारतीय राजनीति में एक युग का भी अंत हो गया। 1969 में राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना संसदीय करियर शुरू करने वाले प्रणब दा अध्यापन और पत्रकारिता के बाद राजनीति के क्षेत्र आए और अंत में देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया।

उनके पांच दशक का राजनीतिक जीवन 1969 में कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सदस्य के रूप में शुरू हुआ। 1973 में वे औद्योगिक विकास विभाग के केंद्रीय उप-मंत्री के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल हुए। 1984 में वे भारत के वित्त मंत्री बने।

कांग्रेस के मजबूत सिपाही रहे प्रणब मुखर्जी के साथ हालांकि एक वक्त ऐसा भी आया जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें कुछ समय के लिए कांग्रेस पार्टी से हटा भी दिया गया था मगर यह कांग्रेस के भीतर उनका राजनीतिक कद ही था कि पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने उन्हें योजना आयोग के उपाध्यक्ष और बाद में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के तौर पर नियुक्त करने का फैसला किया। 1995 से 1996 तक वह विदेश मंत्री रहे।

2004 में पहली बार प्रणब दा ने लोकसभा चुनाव जीता। वर्ष 2007 में उन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण एवं 26 जनवरी 2019 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में प्रणब मुखर्जी भारत के वित्त मंत्री बने। तब उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, लड़कियों की साक्षरता और स्वास्थ्य जैसी सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए वित्तीय प्रबंध किया।

आर्थिक और सामरिक क्षेत्र में उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है। मनमोहन सरकार में बजट के दौरान उन्होंने फ्रिंज बेनिफिट टैक्स और कमोडिटीज ट्रांजिक्शन कर को हटाने सहित कई तरह के कर सुधारों की घोषणा की। उन्होंने ऐलान किया कि वित्त मंत्रालय की हालत इतनी अच्छी नहीं है कि माल और सेवा कर लागू किए बगैर काम चला सकें।

वित्त मंत्रालय में साफ और स्पष्ट तौर पर ऐसा निर्णय लिया जाना आश्चर्यजनक था, मगर इसकी हर तरफ सराहना हुई। अपने कुशल व्यवहार के लिए भी प्रणब दा हमेशा जाने जाते रहेंगे। राष्ट्रपति के अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने अपने इस व्यवहार से सभी का दिल जीता। कुल मिलाकर देश ने आज एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया है जिसके जाने के बाद वह शून्य पैदा हुआ है जिसकी भरपाई मुश्किल है।