बरेली: तेजी से घट रही है देसी गायों की संख्या, कम दुग्ध उत्पादन की वजह से पशुपालकों की देसी गायों में दिलचस्पी घटी
बरेली, अमृत विचार : गोवंश के संरक्षण के लिए तमाम योजनाएं चलाए जाने के बावजूद देसी गायों की संख्या ही तेजी से कम हो रही है। वजह यह है कि जर्सी और संकर गायों की तुलना में देसी गायों का दुग्ध उत्पादन काफी कम है, यही वजह है कि पशुपालकों की देसी गायों को पालने में दिलचस्पी नहीं रह गई है। देसी गायों की कम होती संख्या से चिंतित सरकार ने नस्ल सुधार का अभियान शुरू किया है।
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जिले में फिलहाल करीब 50 गोआश्रय स्थल हैं जिनमें करीब एक हजार गोवंशीय पशु संरक्षित हैं। इनमें ज्यादा संख्या छुट्टी छोड़ी गई देसी गायों की हैं। वजह यह है कि देसी गाय दो से पांच लीटर ही दूध देती है, इतना ही उसके रखरखाव और खाने-पीने पर खर्च हो जाता है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. मेघश्याम वर्मा ने बताया कि देसी गाय दो नस्लों की होती हैं।
पहली उजली गाय जो प्राचीन और स्थानीय नस्ल है, दूसरी लाल और काले रंग वाली साहिवाल नस्ल की गाय होती हैं। कद में बड़ी भूरी-चितकबरी गाय जर्सी नस्ल की होती है। इसके अलावा क्रॉसब्रीड यानी संकर गायें विदेशी और देसी नस्ल से उत्पन्न हैं।
दो से तीन गुना दूध देती हैं दूसरी प्रजाति की गायें: पशुपालकों के अनुसार देसी गाय हर दिन दो से पांच लीटर दूध ही देती है। दूसरी ओर जर्सी गाय आठ से 12, फ्रिजियन 10 से 15 और क्रॉसबीड पांच से आठ लीटर तक दूध देती है। मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी (सीवीओ) के मुताबिक लोग अब देसी गाय नहीं रखना चाहते, इसके बजाय जर्सी, फ्रिजियन, कॉसबीड गाय ज्यादा पाल रहे हैं। जो छुट्टा गोवंशीय पशु पकड़े जा रहे हैं, उनमें दूसरी नस्ल की गायों की भी संख्या काफी है।
सीमन विधि से पैदा होते हैं ज्यादातर बछड़े: पशु चिकित्सकों के मुताबिक प्रदेश में ही नहीं, पूरे देश में देसी गायों की संख्या घट रही है। जर्सी और संकर नस्ल की गायों की संख्या तेजी से बढ़ी है। यह भी एक कारण है कि सीमन विधि से गर्भाधान कराने से ज्यादातर बछड़ों का जन्म हो रहा है। अफसरों का कहना है कि देसी नस्ल के सीमन से ही बछिया का जन्म होता है। इस पर सरकार का फोकस है और इसके लिए अभियान भी चलाया जा रहा है।
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