सोचने की जरूरत
मणिपुर में दो महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाने की घटना पर देशभर में आक्रोश है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को कहा कि इस घटना से देशवासियों को शर्मसार होना पड़ रहा है। वहीं उच्चतम न्यायालय ने इसे ‘पूरी तरह अस्वीकार्य’ बताया।
घटना को लेकर संसद में मानसून सत्र के पहले दिन जोरदार हंगामा हुआ। विपक्ष ने मणिपुर के मुख्यमंत्री के तत्काल इस्तीफे और राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की। गौरतलब है कि मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदाय के बीच 3 मई से जातीय हिंसा हो रही है। अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मैतेई समुदाय की मांग के विरोध में पर्वतीय जिलों में आदिवासी एकजुटता मार्च के आयोजन के बाद झड़पें शुरू हुई थीं।
राज्य में तब से अब तक कम से कम 160 लोगों की जान जा चुकी है। राज्य में इंटरनेट बंद है, हजारों घर जलाए जा चुके हैं, बड़ी संख्या में लोग आश्रय स्थलों या जंगलों में रहे हैं। वास्तव में मणिपुर एक संवेदनशील विषय है। राज्य में इस मुद्दे की पूरी तरह से अनदेखी की गई।
इस मामले में सरकार को पहले ही हस्तक्षेप करके मामले को शांत करना चाहिए था, लेकिन सरकार की ओर से ऐसा नहीं किया गया, जिससे हालात और बिगड़ते गए। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी मणिपुर में जातीय हिंसा और मानवाधिकारों की रक्षा करने में अधिकारियों की अक्षमता पर चिंता जताते हुए सिविल सोसायटी समूहों और सभी जातीय समूहों के सदस्यों के साथ मिलकर काम करने का आग्रह किया था।
मणिपुर में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की संख्या का इस बात से भी अंदाजा लगाया सकता है कि जो वीडियो वायरल हुआ है, वो ढाई महीने पहले का है। समझा जा सकता है कि वहां कितनी घटनाएं हुईं होंगी। मणिपुर में जब से हिंसा की शुरुआत हुई, तब से इंटरनेट बैन है। इस वजह से बहुत सारी चीजें और घटनाएं मणिपुर से बाहर नहीं आ पा रही हैं।
अब जिस तरह का वीडियो सामने आया है, वो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। इस तरह की घटनाओं के जरिए समाज में विभाजन पैदा करके हम किसका भला करना चाहते हैं, इस पर सोचने की जरूरत है। ये दर्शाता है कि सरकार लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही है। एन बीरेन सिंह की सरकार को सत्ता में रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। केंद्र सरकार को क्षेत्र के लोगों को अपनेपन की भावना को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
ये भी पढ़ें- उज्ज्वल संभावनाएं
