करगिल विजय दिवस: लगातार चल रही थीं गोलियां, न खून की परवाह की न दर्द की, बस एक ही जज्बा था कि...
आज करगिल विजय दिवस है। आज ही के दिन भारतीय सेना ने साहस के बल पर 60 दिन तक चले कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना को करारी शिकस्त दी थी। 1999 में हुए इस युद्ध में शूरवीरों ने अपने साहस के दम पर दुश्मनों को घुटने टिकवा दिए थे। इस युद्ध में हिस्सा लेने वाले शूरवीरों ने बताया कि सामने दुश्मन था। लगातार गोलियां चल रही थीं पर न खून की परवाह की न दर्द की। बस एक ही जज्बा था कि लक्ष्य युद्ध जीतना है।
कैप्टन रविंदर कुमार ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान वह सेना की पैराशूट रेजीमेंट में थे और सियाचिन में तैनात थे। वह ऑपरेशन मेघदूत के तहत वहां पर थे। जब युद्ध छिड़ गया तो इस ऑपरेशन के खत्म होने पर उनकी बटालियन को विकल्प दिया कि वे यहां से वापस जा सकते हैं लेकिन उनके सीओ कर्नल अशोक कुमार श्रीवास्तव ने अपनी यूनिट को कारगिल युद्ध में भेजने का विकल्प चुना।
वहां से बटालिक सेक्टर में भेजा गया। इसके बाद पहाड़ी पर बैठे दुश्मन को खत्म करके चोटी फतह करने का आदेश हुआ। वहीं उन्होंने बताया कि 20 साथियों के साथ बर्फीली चोटी पर चढ़े इस दौरान दुश्मन गोलियां बरसा रहे थे। दुश्मनों को खत्म करने के जुनून में सभी साथी तेजी से चोटी पर चढ़े और दुश्मन का बंकर नष्ट करके पांच पाकिस्तानी सैनिकों को खत्म किया। उन्होंने बताया कि इस दौरान उनके चार साथी भी शहीद हो गए।
उन्होंने बताया उनके बाएं जांघ पर गोली लगी तो उन्होंने बर्फ की पट्टी बांधी ली। स्थितियां ये थीं कि बर्फ को पिघलाकर तीन दिन तक पानी पीते रहे और चोटी पर डटे रहे। 26 जुलाई को सीज फायर होने के बाद ही चोटी से नीचे आए। उनकी बहादुरी के लिए 26 जनवरी 2020 को तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायण ने उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया।
वहीं सूबेदार अवधेश सिंह ने बताया कि सेना में 1987 से 2017 तक राजपूत रेजीमेंट की 27वीं में यूनिट में रहे। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी कंपनी को दुर्गम पहाड़ी प्वाइंट 5770 फतेह करने का आदेश हुआ। इस प्वाइंट पर पाकिस्तान की सेना ने कब्जा कर लिया था। टीम लीडर मेजर नवजोत सिंह चीमा की अगुवाई में जवानों ने रेंग-रेंगकर ऊपर चढ़ना शुरू किया। ऊपर बैठा दुश्मन लगातार गोलियां और बम फेंक रहा था।
हम लोग भी लगातार फायरिंग करने के साथ आगे बढ़ते गए। 27 जून को चोटी पर कब्जा कर लिया और पोस्ट कमांडर समेत 12 दुश्मनों को खत्म किया। इसके बाद दूसरे पहाड़ों पर छिपे दुश्मनों ने फिर से काउंटर अटैक किया। इसमें 28 जून को उनके साथी राजस्थान निवासी भगवान सिंह शहीद हो गए। कुछ छर्रे उनके को भी लगे थे। वहीं उन्होंने बताया कि उनके परिवार में सात लोग सेना में हैं। बेटा रामवीर सिंह सेना में नायक है। भतीजा संदीप सिंह हवलदार, बड़े भाई रामसजीवन सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
वहीं सूबेदार सुरेश सिंह ने बताया कि वह पैरा रेजीमेंट में थे। कारगिल युद्ध के दौरान रेजीमेंट के जवानों को बटालिक सेक्टर पहुंचने का आदेश हुआ। वह 11 जुलाई से 22 जुलाई तक वहां रहे और दुश्मनों के कब्जे से 29 ट्रिग हाइट, 509 चोटी पर फतेह की। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान सात दिन का समझौता भी हुआ था। इस दौरान दुश्मनों ने जगह-जगह माइंस बिछा दी थी। इनकी चपेट में आने से कई जवान शहीद हो गए थे।
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