प्रस्ताव का औचित्य
मणिपुर हिंसा को लेकर संसद में जारी गतिरोध के बीच बुधवार को लोकसभा में सरकार के खिलाफ कांग्रेस द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई। अविश्वास प्रस्ताव का परिणाम पहले से तय है क्योंकि विपक्षी दलों की संख्याबल के लिहाज से प्रस्ताव का गिरना निश्चित है।
विपक्षी समूह के निचले सदन में 150 से कम सदस्य हैं। ऐसे में यह अविश्वास प्रस्ताव एक औपचारिकता है। हालांकि विपक्षी दलों का तर्क है कि यह मणिपुर मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसद में बोलने के लिए मजबूर करने की रणनीति है। यानि संसद में प्रधानमंत्री के बयान की मांग को लेकर पांच दिनों से हंगामा कर रहे विपक्षी गठबंधन ने अपने तरकश के सबसे घातक अस्त्र को निकाला है।
इस अविश्वास प्रस्ताव का मकसद ये है कि किसी तरह प्रस्ताव लाकर सदन को चर्चा के लिए राज़ी किया जाए और चर्चा के दौरान विपक्ष मणिपुर मुद्दे पर सरकार को घेरकर असंवेदनशील साबित कर सके। कुल मिलाकर विपक्ष का मकसद प्रधानमंत्री को बोलने के लिए मजबूर करने से देखा जा सकता है। इस अविश्वास प्रस्ताव पर अमूमन दो दिन चर्चा होती है, तो विपक्ष को सरकार पर हमला करने और सवाल करने के लिए 48 घंटे मिल जाएंगे।
विपक्ष अभी तक लोकसभा में नियम 267 के तहत बहस की बात कर रहा था जिसमें सिर्फ मणिपुर के मुद्दे पर चर्चा होती, लेकिन सत्ता पक्ष नियम 176 पर अड़ा था जिसमें सिर्फ ढाई घंटे मिलते हैं। यही कारण है कि विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लेकर आया है। नियम 267 के तहत कोई भी चर्चा संसद में इसलिए बहुत महत्व रखती है क्योंकि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर चर्चा के लिए अन्य सभी कामों को रोक दिया जाता है। जबकि नियम 176 किसी विशेष मुद्दे पर अल्पकालिक चर्चा की अनुमति देता है, जो ढाई घंटे से अधिक नहीं हो सकती।
आपको बता दें कि वर्ष 2018 में भी विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आया था, जो असफल रहा था, क्योंकि इसके खिलाफ 325 सांसदों ने वोट दिया था। इस बीच कांग्रेस का मानना है कि अविश्वास प्रस्ताव भले ही संख्या बल के संतुलन के कारण पारित नहीं हो पाए, लेकिन इससे ‘देश’ की भावना का प्रकटीकरण होगा। उधर विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार के आत्मविश्वास को देखकर यह कहना ज्यादा सही होगा कि सत्ता पक्ष ने विपक्ष को अपने दिल का गुबार निकालने का मौका देकर सदन में लंबित विधेयकों को पारित करवाने का माहौल बना लिया है।
