अंतरिक्ष में उपलब्धि

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लगातर ऊंची छलांग लगा रहा है। चंद्रयान-3 के बाद भारतीय अतंरिक्ष अनुसंधान संगठन ( इसरो)  ने फिर से एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रविवार को इसरो के पीएसएलवी-सी 56 का प्रक्षेपण किया गया और सात विदेशी उपग्रहों को निर्धारित कक्षाओं में सफलतापूर्वक स्थापित किया। भारत को दुनिया में कम लागत पर अंतरिक्ष संबंधी सेवा प्रदाता देश के रूप में प्रचारित-प्रसारित करने की परिकल्पना प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी ने की थी। मौजूदा सरकार के समय में रॉकेट और अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत ने कई उपलब्धियां हासिल कीं।

देश के छात्रों, युवाओं और उनके स्टार्टअप के लिए अंतरिक्ष विज्ञान में अवसर खुले हैं। इस दौरान देश ने 55 अंतरिक्ष यान, 50 प्रक्षेपण यान अभियान शुरू किए तथा 11 छात्र उपग्रह प्रक्षेपित किए। शनिवार को गृहमंत्री अमित शाह ने एक कार्यक्रम में बताया कि एक ही उड़ान में रिकॉर्ड 104 उपग्रहों (पीएसएलवी-सी37, ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान से) को प्रक्षेपित किया गया और एक उपग्रह के पुनः प्रवेश (पृथ्वी के वायुमंडल में) का प्रयोग भी सफलतापूर्वक पूरा किया गया। 

पीएसएलवी सिस्टम को दुनिया के सबसे विश्वसनीय प्रक्षेपकों में से एक माना जाता है। इसरो ने पहले भी दूसरे देशों के लिए उपग्रह को लांच किया है। ध्यान रहे दुनिया के कुछ ही देशों के पास अंतरिक्ष में उपग्रह प्रक्षेपित करने की क्षमता है। इनमें उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देश भी शामिल हैं। परंतु उनकी क्षमताएं बहुत ज्यादा विकसित नहीं हैं।

लांच सेवाओं को किराये पर लेने के लिए यूरोपीय संघ, अमेरिका, रूस, जापान और चीन अच्छे विकल्प हैं। ऐसे देश जो अपने दम पर उपग्रह लांच कर सकते हैं, वे भी इसरो को चुन रहे हैं। इनमें अमेरिका, जापान, फ्रांस और इजरायल शामिल हैं। मिशन को लेकर इसरो ने बताया है कि सिंगापुर के डीएस-एसएआर उपग्रह डीएसटीए का वजन 360 किलो है। इसको सिंगापुर से भारत की साझेदारी के तहत विकसित किया गया है। पीएसएलवी को इसरो का वर्कहॉर्स कहा जाता है। यह लगातार उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में प्रक्षेपित करने का काम कर रहा है।

इसरो का यह पूरी तरह व्यावसायिक मिशन है। उपग्रह लांच करना उसकी कमाई का बड़ा हिस्सा बन चुका है। बड़े देश भी  इस मामले में उसकी विशेषज्ञता का लोहा मानते हैं। इन उपलब्धियों ने इसरो को अंतरिक्ष की दौड़ में बड़ी मजबूत स्थिति में ला दिया है। कहा जा सकता है कि अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत पूरी दुनिया में नेतृत्व करेगा।