गौरवशाली इतिहास : बरेली में भी जांबाजी के साथ लड़ी गई थी आजादी की लड़ाई
जिला प्रशासन के रिकॉर्ड के मुताबिक बरेली में 398 दीवानों ने स्वतंत्रता आंदोलन में की थी सक्रिय भागीदारी
बरेली, अमृत विचार। आजादी की लड़ाई बरेली में भी बहुत जांबाजी के साथ लड़ी गई थी। जिला प्रशासन के रिकार्ड के अनुसार जनपद के 398 लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। इनमें कई ने आजादी की लड़ाई के लिए सरकारी नौकरियां छोड़ दीं, कांग्रेस में शामिल होने के बाद आजादी के आंदोलन में सक्रिय हो गए। इस बीच जीवन के कई साल जेलों में भी काटे। देश आजाद होने के बाद कई गुमनामी के अंधेरे में खो गए तो करीब 20 स्वतंत्रता सेनानी आजादी के बाद भी जनप्रतिनिधि के रूप में उजड़े वतन को संवारने के लिए जूझते रहे।
इन्होंने आजादी दिलाने के साथ बरेली के जनकल्याण में भी भूमिका निभाई
आजमनगर में रहने वाले अब्दुल रऊफ 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान नजरबंद किए गए। बाद में विधायक भी बने। अब्दुल वाजिद ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का पद त्यागकर कांग्रेस में शामिल हुए। 1940 में सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने पर एक साल की सजा हुई। सेंट्रल असेंबली का सदस्य रहने के साथ बरेली नगर पालिका के अध्यक्ष रहे थे। पूरनमल बजरिया के अधो नारायन ने 1921 में असहयोग आंदोलन में भाग लेकर छह महीने की कैद काटी। 1930 में नमक सत्याग्रह पर छह महीने के लिए जेल गए थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह पर एक साल कैद हुई। भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए तो नौ अगस्त 1942 काे पकड़ लिया गया, फिर 1943 में रिहा हुए। नगर पालिका बरेली के सदस्य भी रहे।
कूंचा रतनगंज के गोपीनाथ साहू ने 1930 और 1940 में छह और फिर नौ महीने की सजा काटी। भारत छोड़ो आंदोलन में नौ अगस्त 1942 को नजरबंद होने के बाद 1944 में जेल से छूटे। नगर पालिका बरेली के सदस्य रहने के साथ जिला और शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे थे। बमनपुरी के जियाराम सक्सेना को असहयोग आंदोलन के सक्रिय रहन ेपर 1922 में तीन साल की कैद हुई। वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहने के साथ नगर पालिका बरेली के चेयरमैन भी रहे। महावीर टोला कूंचा मुंशी भागीरथ के टिकैत राम वर्मा 1920 में असहयोग आंदोलन में शामिल हुए थे। स्कूलों-कॉलेजों का बहिष्कार कर कौमपरस्त अखबार निकालकर लोगों को एकजुट किया और जेल भी गए।
आंवला के गांव उरला के दुर्राब सिंह को व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने पर छह महीने की कैद हुई। वह जिला परिषद के सदस्य भी रहे थे। बुधौली के पृथ्वी राज सिंह डिप्टी कलेक्टर का पद त्यागकर कांग्रेस में शामिल हुए थे। 19 साल तक जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे, नमक सत्याग्रह करने पर छह महीने की सजा काटी थी। 1937 में विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। रामबाग के प्रताप चंद्र आजाद 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में जेल गए थे। 1947 में उप्र छात्र संघ के अध्यक्ष रहे। बाद में विधान परिषद के सदस्य रहने के साथ जिला परिषद बरेली के अध्यक्ष रहे।
कूंचा सीताराम के ब्रज मोहन लाल शास्त्री ने असहयोग आंदोलन में पढ़ाई छोड़ दी थी, उन्हें 1930 में दो साल की सजा हुई। भारत छोड़ो आंदोलन में 30 महीने नजरबंद रहे। नगर और जिला परिषद के अध्यक्ष रहने के साथ विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। नया टोला आलमगिरीगंज के सतीश चंद्र 1936 में कांग्रेस से जुड़े थे। आजादी की लड़ाई में भाग लिया। 1940 से 42 तक अंतरित संसद के सदस्य करने के साथ लोकसभा सदस्य भी चुने गए और केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे थे।
दामोदर स्वरूप सेठ : काकोरी केस में बने अभियुक्त
बिहारीपुर के दामोदर स्वरूप सेठ चर्चित काकोरी केस के अभियुक्त थे। कई बार जेल गए। वह अंतरित संसद के सदस्य रहने के साथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रधान भी रहे थे। इनके नाम पर चौकी चौराहे के पास पार्क है जिसमें उनकी प्रतिमा भी लगी है।
नौरगंलाल : सेंट्रल जेल में बंद रहे कई साल
बमनपुरी के नौरगंलाल को सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने पर छह महीने कैद हुई थी। सत्याग्रह में शामिल होने पर एक साल जेल में रहे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान नौ अगस्त 1942 से 1944 तक सेंट्रल जेल में कैद रहे। जिला भ्रष्टाचार निरोधक समिति के अध्यक्ष रहने के साथ 1962 से लेकर 1967 तक विधायक भी रहे थे।
दरबारी लाल शर्मा : आजादी की लड़ाई में पत्नी ने भी निभाया साथ
जगतपुर निवासी दरबारी लाल शर्मा को 1930 में एक साल की कैद हुई थी। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने पर 1932 में भी छह महीने की कैद के साथ 15 रुपये जुर्माना लगा था। कई पदों पर भी रहे। उनकी पत्नी कुसुम कुमारी भी 1930 में कांग्रेस में शामिल हुईं। नमक सत्याग्रह में भाग लेने पर 1930 में ही उन्हें छह माह की कैद हुई। वह जिला परिषद बरेली की सदस्य भी रहीं। 1959 में कामनवेल्थ में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
धर्मदत्त वैद्य : आजादी के लिए लड़े, फिर तरक्की के लिए जूझे
बरेली: धर्मदत्त वैद्य 1929 में कांग्रेस के सदस्य बने थे। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार के मामले में 1930 में गिरफ्तार हुए। 28 सितंबर 1939 को फिर गिरफ्तार हुए, दो मामलों में एक-एक साल की कैद हुई। 1942 में रुहेलखंड और कुमाऊं में आंदोलन की अगुवाई करने पर पकड़े गए और ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें 18 महीने नजरबंद रखा। 1947 में पाकिस्तान जाकर शरणार्थियों काे भारत लाने के दौरान भी लायलपुर में नजरबंद किया गया। आजादी के बाद भारतीय चिकित्सा परिषद उप्र और जिला बोर्ड बरेली के पदाधिकारी रहे थे। नगर कांग्रेस कमेटी में अध्यक्ष रहे। 1952 से लेकर 1967 तक लगातार विधायक रहे। 1969 में फिर विधायक चुने गए। 1960 से 1962 तक उप्र सरकार में मंत्री रहे, 1970 में फिर राज्यमंत्री रहे। उनके पोते डॉ. अनुपम शर्मा धर्मदत्त सिटी हाॅस्पिटल चला रहे हैं।
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