शंका समाधान
प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यपालों और कुलपतियों के वर्चुअल कांफ्रेंस में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का पूरा खाका समझाया। उन्होंने कहा कि हम ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनाने जा रहे हैं। नई शिक्षा नीति, पढ़ने के बजाय सीखने पर फोकस करती है और पाठ्यक्रम से आगे बढ़कर आलोचनात्मक सोच पर जोर देती है। प्रधानमंत्री मोदी ने नई …
प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यपालों और कुलपतियों के वर्चुअल कांफ्रेंस में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का पूरा खाका समझाया। उन्होंने कहा कि हम ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनाने जा रहे हैं। नई शिक्षा नीति, पढ़ने के बजाय सीखने पर फोकस करती है और पाठ्यक्रम से आगे बढ़कर आलोचनात्मक सोच पर जोर देती है। प्रधानमंत्री मोदी ने नई शिक्षा नीति को देश के युवाओं को भविष्य की आवश्यकताओं के लिए तैयार करने वाला बताया है।
नई शिक्षा नीति की घोषणा गत 29 जुलाई को की गई थी। इस नीति की घोषणा के उपरान्त बुद्धिजीवियों, आम जनता एवं शिक्षा जगत में मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई थी। सांसद शशि थरूर ने आशंका जताई थी कि इस नीति में रखे कई लक्ष्य ऐसे हैं जिनके पूरे होने की संभावना कम है। दिल्ली विश्वविद्यालय के संगठन डूटा ने आपत्ति जताई थी कि इसके द्वारा विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को बोर्ड ऑफ़ गवर्नर के ज़िम्मे झोंक देना गलत है।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करने पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए सोमवार को प्रधानमंत्री ने कहा कि जब किसी भी सिस्टम में इतने व्यापक बदलाव होते हैं, तो कुछ शंकाएं-आशंकाएं स्वाभाविक ही हैं। उन्होंने सही कहा कि आखिर हम सभी को मिलकर ही तो तमाम शंकाओं और आशंकाओं का समाधान करना है।
प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में कांफ्रेंस में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि नई शिक्षा नीति केवल एक नीतिगत दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारत के शिक्षार्थियों एवं नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है। यह इक्कीसवीं सदी की पहली शिक्षा नीति है, जिसे पिछली राष्ट्रीय शिक्षा नीति के 34 वर्षों के बाद घोषित किया गया था। देश भर में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विभिन्न पहलुओं पर वेबिनार, आभासी सम्मेलन और सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। जिनमें कहा जा रहा है कि नई शिक्षा नीति में शिक्षा अधिकार कानून 2009 की परिधि के विस्तार पर चुप्पी साध ली गई है।
उम्मीद है कि नई नीति शिक्षा अधिकार कानून, 2009 में बदलाव कर खत्म की गई ‘नो डिटेन्शन पॉलिसी’ पर पुनर्विचार करेगी। नई नीति में एक समस्या भाषा को लेकर भी है जो भारत में बहुत संवेदनशील मसला है। भाषा कौन सी हो? प्रादेशिक भाषा या मातृभाषा। दरअसल भाषा का विभाजन केवल प्रादेशिक ही नहीं क्षेत्रीय भी करना पड़ेगा। ऑनलाइन, डिजिटल और दूरस्थ शिक्षा के माध्यमों पर ज़ोर देने और विद्यालयों-महाविद्यालयों की संख्या घटाने से ‘पड़ोस का विद्यालय’ की कोठारी आयोग और समान स्कूल प्रणाली की अनुशंसा और सार्वदेशिक रूप से स्थापित अवधारणा भी ध्वस्त हो जाएगी, जिसे पहले भी अंगीकार नहीं किया जा सका था।
